Nepal Baadh नेपाल के रसुवा जिले में आई भीषण बाढ़ में कोलकाता के 32 सदस्यीय दल सहित मुंबई के दर्जनों श्रद्धालु लापता। जानें पूरी घटना, बचाव अभियान और ताज़ा अपडेट्स।

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नेपाल में भीषण बाढ़ की तबाही: कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए मुंबई, कोलकाता के दर्जनों श्रद्धालु लापता ,”छह महीने से तैयारी कर रहे थे”
Nepal Baadh,हिमालय की गोद में बसा नेपाल एक बार फिर प्रकृति के भीषण प्रकोप का शिकार हुआ है। 26-27 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा से सटे रसुवा (Rasuwa) जिले में अचानक आई भीषण बाढ़ ने सैकड़ों जिंदगियों को निगल लिया और सैकड़ों लोगों को लापता कर दिया। इस त्रासदी ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया है, क्योंकि इस बाढ़ की चपेट में आने वालों में बड़ी संख्या भारतीय श्रद्धालुओं की भी है,
जो कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए महीनों पहले से तैयारी कर रहे थे। मुंबई और कोलकाता से गए तीर्थयात्रियों के समूह इस हादसे के बाद से लापता हैं, और उनके परिवार वाले बेसब्री से किसी शुभ समाचार का इंतजार कर रहे हैं। इस ब्लॉग में हम इस पूरी घटना, इसके कारणों, अब तक मिली जानकारी, बचाव अभियान और प्रभावित परिवारों की कहानियों को विस्तार से समझेंगे।
घटना कब और कैसे हुई?
बुधवार, 26 अगस्त 2026 की सुबह करीब 8:30 से 8:40 बजे के बीच नेपाल के रसुवा जिले में एक भयंकर बाढ़ ने तबाही मचानी शुरू की। यह इलाका नेपाल और चीन (तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र) की सीमा पर स्थित है और रसुवागढ़ी (Rasuwagadhi), तिमुरे (Timure) और स्यभरुबेसी (Syabrubesi) जैसे कस्बे इस तबाही के केंद्र में आए। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह आपदा हिमालय क्षेत्र में एक विशाल हिमखंड (ग्लेशियर) के अचानक टूटने और उसके बाद हुए भूस्खलन की वजह से आई। इस हिमखंड के टूटने से बना मलबा और पानी तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहा, जिसने रास्ते में आने वाले गांवों, बाजारों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को पूरी तरह तबाह कर दिया।
गौरतलब है कि यही वह मार्ग है जो नेपाल की राजधानी काठमांडू को चीन के केरुंग (Kerung) व्यापारिक मार्ग से जोड़ता है, और यही रास्ता कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भी इस्तेमाल होता है। मानसून के मौसम में हर साल हजारों भारतीय श्रद्धालु इसी मार्ग से होते हुए तिब्बत में स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के दर्शन के लिए जाते हैं। दुर्भाग्य से, जिस समय यह विनाशकारी बाढ़ आई, उस समय सैकड़ों तीर्थयात्री ठीक रसुवागढ़ी के आव्रजन (इमिग्रेशन) कार्यालय के आसपास मौजूद थे, जहां से उन्हें तिब्बत में प्रवेश करना था।
नेपाल के सड़क विभाग के अनुसार, न्युवाकोट जिले के बेत्रावती से लेकर रसुवागढ़ी सीमा तक की पूरी 42 किलोमीटर लंबी सड़क कई जगहों से पूरी तरह नष्ट हो गई है, जिसमें कई कंक्रीट के पुल भी शामिल हैं। सीमा के करीब का एक और 16 किलोमीटर का हिस्सा, जिसे हाल ही में चीनी सरकार की वित्तीय मदद से अपग्रेड किया गया था, वह भी बह गया। इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि तबाही कितनी भीषण रही होगी।
अब तक का मरने वालों और लापता लोगों का आंकड़ा
इस आपदा के आंकड़े लगातार बदल रहे हैं और हर घंटे नई जानकारी सामने आ रही है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार रसुवा जिले में कम से कम 157 लोगों की मौत हुई थी, लेकिन जैसे-जैसे तलाशी अभियान आगे बढ़ रहा है, यह आंकड़ा भयावह रूप से बढ़ता जा रहा है। ताजा जानकारी के अनुसार पूरे नेपाल में मरने वालों की संख्या 350 के पार जा चुकी है, और सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
बाढ़ का असर सिर्फ रसुवा तक सीमित नहीं रहा। चितवन, नवलपरासी पूर्व, धादिंग, गोरखा, तनहुं, नवलपरासी पश्चिम और न्युवाकोट जैसे कई जिलों से भी शव बरामद किए गए हैं, जिससे यह जाहिर होता है कि बाढ़ का पानी नारायणी नदी के जरिए कितनी दूर तक फैल गया। सशस्त्र पुलिस बल के अनुसार अकेले नारायणी नदी से सैकड़ों शव बरामद किए जा चुके हैं। चितवन के शवगृह पूरी तरह भर चुके हैं और वहां शवों की पहचान के लिए एक अलग केंद्र स्थापित किया गया है।
नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार लापता लोगों में करीब 179 लोग भारतीय नागरिक हैं, जिनमें से अधिकांश कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे थे। इसके अलावा अमेरिका के 65, ऑस्ट्रेलिया के 35, ब्रिटेन के 33 और कनाडा के 25 नागरिक भी लापता सूची में शामिल हैं। यह आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह हादसा कितना अंतरराष्ट्रीय स्तर का है और इसमें दुनिया भर से आए श्रद्धालु और पर्यटक फंसे हुए हैं।
नेपाल पुलिस ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए “अज्ञात और लावारिस” शवों की एक वेबसाइट भी जारी की है, ताकि लोग अपने प्रियजनों की पहचान कर सकें। इस वेबसाइट पर अब तक 80 से अधिक पेज हैं, जिनमें प्रत्येक पेज पर करीब 20 शवों की जानकारी दर्ज है — यह अपने आप में इस त्रासदी की भयावहता को बयां करने के लिए काफी है।
कोलकाता का 32 सदस्यीय दल लापता
इस हादसे में सबसे ज्यादा सुर्खियों में आया कोलकाता से गया 32 सदस्यों का एक दल, जो कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए निकला था। पश्चिम बंगाल सरकार के एक अधिकारी के अनुसार, यह दल 21 अगस्त को कोलकाता से रवाना हुआ था और अगले ही दिन, यानी 22 अगस्त को नेपाल पहुंच गया था। दल में कुल 30 तीर्थयात्री और 2 टूर मैनेजर शामिल थे। यह समूह बुधवार सुबह रसुवागढ़ी पहुंचा था, जहां से उन्हें तिब्बत में प्रवेश करना था।
कोलकाता स्थित ट्रैवल एजेंसी के प्रतिनिधि दिब्य ज्योति बसु के अनुसार, यह पूरा दौरा काठमांडू की “समराट ट्रैवल एजेंसी” द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके पास अपना खुद का हेलीकॉप्टर भी है। समूह के सदस्य सुबह करीब 8:30 बजे आव्रजन कार्यालय में मौजूद थे, ठीक उसी समय जब भीषण बाढ़ ने नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया।
इस समूह के साथ जयंत सान्याल और नृपेन सरकार नाम के दो टूर मैनेजर भी थे, जिनके पास मोबाइल रोमिंग की सुविधा थी और जिनसे सुबह करीब 8 बजे आखिरी बार संपर्क हुआ था। कुछ तीर्थयात्रियों ने उसी समय के आसपास फेसबुक पर लाइव वीडियो भी डाला था, लेकिन बाढ़ की खबर आने के बाद से इस पूरे समूह से कोई संपर्क नहीं हो पाया है।
बसु के अनुसार, कोलकाता के अलावा हुगली जिले के चंदननगर और उत्तर 24 परगना जिले के बारासात के निवासी भी इस लापता या फंसे हुए समूह में शामिल बताए जा रहे हैं। दल को संभालने वाली एजेंसी ने प्रभावित क्षेत्र में अपना हेलीकॉप्टर भेजा है ताकि तलाशी और बचाव कार्य में मदद मिल सके।
एक वीजा रिजेक्शन ने बचाई जान
इस पूरी त्रासदी के बीच एक ऐसी कहानी भी सामने आई है, जो किस्मत के अजीब खेल को दर्शाती है। पश्चिम बंगाल की रहने वाली 61 वर्षीय तपती सिन्हा भी इसी 32 सदस्यीय दल का हिस्सा बनने वाली थीं, लेकिन ठीक यात्रा से कुछ दिन पहले उनका चीनी वीजा बिना किसी कारण के खारिज कर दिया गया। निराश होकर उन्होंने अपना कार्यक्रम बदला और कैलाश मानसरोवर की बजाय लद्दाख जाने का फैसला किया।
तपती सिन्हा मई महीने से ही इस यात्रा की तैयारी कर रही थीं — बैठकों में हिस्सा लिया, खरीदारी की, और यात्रा से पहले होने वाले ट्रेकिंग सत्रों में भी शामिल हुईं। लेकिन वीजा रिजेक्शन ने उन्हें उस भयावह हादसे से बचा लिया, जिसमें उनके साथ यात्रा पर जाने वाले बाकी सभी 32 सदस्य लापता हो गए। जैसे ही उन्हें बाढ़ की खबर मिली, उन्होंने तुरंत अपनी लद्दाख यात्रा छोटी की और वापसी की।
मीडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया कि वे दिल्ली पहुंच चुकी हैं और शाम तक कोलकाता एयरपोर्ट पहुंचने की उम्मीद कर रही हैं। उनकी यह कहानी इस बात की याद दिलाती है कि किस तरह जिंदगी और मौत के बीच का फासला कभी-कभी महज एक संयोग पर टिका होता है।
मुंबई और महाराष्ट्र से जुड़े श्रद्धालु
कैलाश मानसरोवर यात्रा में महाराष्ट्र और खासकर मुंबई-पुणे क्षेत्र के श्रद्धालुओं की भागीदारी हमेशा से बड़ी रही है। इस बार भी मुंबई के दर्जनों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होने के लिए महीनों पहले से तैयारी कर रहे थे — कोई योग और फिटनेस ट्रेनिंग ले रहा था तो कोई ऊंचाई पर सांस लेने की दिक्कतों से निपटने के लिए विशेष अभ्यास कर रहा था।
भारत में कैलाश मानसरोवर यात्रा को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए इसकी तैयारी में लोग अक्सर छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लगाते हैं — शारीरिक फिटनेस से लेकर आवश्यक दस्तावेज़ जुटाने तक।
नेपाल के रास्ते जाने वाले निजी टूर ऑपरेटरों के जरिए यह यात्रा तुलनात्मक रूप से सस्ती और सुलभ मानी जाती है, इसलिए हर साल हजारों की संख्या में भारतीय श्रद्धालु इसी मार्ग को चुनते हैं। भारत सरकार भी उत्तराखंड और सिक्किम के रास्ते एक आधिकारिक कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करती है, लेकिन नेपाल के जरिए जाने वाले निजी दल कहीं अधिक संख्या में होते हैं। मुंबई से जुड़े जिन परिवारों का इस हादसे से सरोकार है, वे लगातार अपने ट्रैवल ऑपरेटरों और भारतीय दूतावास से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि अपने प्रियजनों की सलामती की खबर मिल सके।
“हमने छह महीने से इसकी तैयारी की थी”
इस त्रासदी की सबसे मार्मिक बात वह भावनात्मक तैयारी है जो हर श्रद्धालु परिवार ने इस यात्रा के लिए की थी। कैलाश मानसरोवर यात्रा केवल एक पर्यटन यात्रा नहीं, बल्कि जीवन में एक बार होने वाला आध्यात्मिक अनुभव मानी जाती है। इसके लिए ज़रूरी तीन दस्तावेज़ — चीनी समूह वीजा, तिब्बत यात्रा परमिट और एलियन ट्रैवल परमिट — तैयार करने में महीनों लग जाते हैं। इनमें से किसी एक दस्तावेज़ में भी देरी या अस्वीकृति होने पर पूरी यात्रा रुक सकती है।
इसके अलावा शारीरिक तैयारी भी उतनी ही अहम होती है, क्योंकि यह यात्रा 15,000 से 17,000 फीट की ऊंचाई तक जाती है, जहां ऑक्सीजन का स्तर काफी कम होता है। इसीलिए श्रद्धालु महीनों पहले से चलना, ट्रेकिंग, योग और सांस से जुड़े व्यायाम शुरू कर देते हैं। परिवार और दोस्त मिलकर विदाई समारोह आयोजित करते हैं, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, और यात्रा को लेकर पूरे उत्साह के साथ तैयारियों में जुट जाते हैं। ऐसे में जब यह यात्रा इस तरह की भीषण त्रासदी में बदल जाती है, तो पूरे परिवार और समुदाय पर इसका गहरा भावनात्मक असर पड़ता है। महीनों की उम्मीदें और तैयारियां रातोंरात चिंता और भय में बदल जाती हैं।

बचाव अभियान और सरकारों की प्रतिक्रिया
नेपाल सरकार ने इस आपदा के तुरंत बाद बचाव अभियान तेज कर दिया। नेपाल आर्मी, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों को हेलीकॉप्टरों और नावों के साथ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किया गया। तिमुरे, ढुंचे, स्यभरुबेसी, उत्तरगया और बिदुर जैसे इलाकों से अब तक सैकड़ों लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है — जिनमें 88 नेपाली नागरिक, 11 भारतीय, 8 चीनी, 4 कोरियाई और 2 अमेरिकी शामिल हैं।
भारत सरकार ने भी इस स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखी है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने राहत विमानों को तैयार रखा है और काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने प्रभावित परिवारों की मदद के लिए हॉटलाइन नंबर जारी किए हैं, जिसमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम सहित कई भाषाओं में बात करने वाले कर्मचारी भी शामिल हैं। नेपाल के विदेश मंत्री ने भी भारत और चीन दोनों से मदद का अनुरोध किया है, ताकि बचाव कार्यों को तेज गति दी जा सके।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस त्रासदी पर संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं। तिब्बती बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने पीड़ितों के लिए प्रार्थना की है, वहीं पोप लियो XIV ने भी शोक संतप्त परिवारों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की है। भारतीय आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने भी सोशल मीडिया पर बताया कि उनके ईशा फाउंडेशन द्वारा आयोजित समूह के 77 लोग, जो कैलाश से लौट रहे थे, तिब्बत के ग्यीरोंग स्थित आव्रजन केंद्र में सुरक्षित हैं।
सड़क और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान
इस बाढ़ ने न सिर्फ जानें लीं, बल्कि नेपाल के बुनियादी ढांचे को भी बुरी तरह तबाह कर दिया है। नेपाल के सड़क विभाग के मुताबिक कम से कम 19 सड़क पुल और करीब 40 किलोमीटर लंबी सड़कें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुई हैं, जिससे काठमांडू-केरुंग व्यापारिक मार्ग पूरी तरह बाधित हो गया है। ऊर्जा मंत्रालय के शुरुआती अनुमान के अनुसार जलविद्युत क्षेत्र को भी करीब 431 मेगावाट की क्षमता का नुकसान हुआ है। इससे साफ है कि नेपाल को इस आपदा से उबरने में लंबा समय लगेगा।
गौरतलब है कि यह बाढ़ ऐसे समय आई है जब मानसून सीजन में हर साल इस क्षेत्र में भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालयी क्षेत्र में हिमखंडों के टूटने और अस्थिर होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यह इस बात का संकेत है कि भविष्य में इस तरह की आपदाएं और अधिक बार हो सकती हैं, खासकर उन इलाकों में जो तीर्थयात्रा और पर्यटन मार्गों पर स्थित हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा और नेपाल मार्ग का महत्व
कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदू, बौद्ध, जैन और तिब्बती बॉन परंपरा के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है। हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है, जबकि मानसरोवर झील को पार्वती देवी से जोड़ा जाता है।
श्रद्धालु परंपरागत रूप से कैलाश पर्वत की परिक्रमा करते हैं, जो करीब 53 किलोमीटर लंबी होती है और इसे पूरा करने में करीब तीन दिन लगते हैं। हिंदू और बौद्ध अनुयायी पर्वत की परिक्रमा घड़ी की दिशा में करते हैं, जबकि बॉन परंपरा के अनुयायी इसके विपरीत दिशा में। मानसरोवर झील के पवित्र जल में स्नान करना भी आध्यात्मिक शुद्धिकरण का एक अहम हिस्सा माना जाता है।
भारत सरकार हर साल जून से अगस्त-सितंबर के बीच उत्तराखंड और सिक्किम के रास्ते एक आधिकारिक कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करती है, लेकिन इसके समानांतर निजी टूर ऑपरेटर नेपाल के रास्ते भी यह यात्रा आयोजित करते रहे हैं। नेपाल का यह मार्ग अपेक्षाकृत सस्ता और आसान माना जाता है, यही वजह है कि हर साल हजारों की संख्या में भारतीय श्रद्धालु इसी रास्ते को प्राथमिकता देते हैं। रसुवागढ़ी सीमा चौकी को 2017 में अंतरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया था, जिसके बाद यह वीजा और पासपोर्ट के जरिए सीमा पार करने का सबसे किफायती विकल्प बन गया।
आगे की चुनौतियां
इस आपदा के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती है — लापता लोगों की तलाश और उनकी पहचान। नेपाल पुलिस और सेना की टीमें लगातार मलबे और नदियों में तलाशी अभियान चला रही हैं, लेकिन खराब मौसम, ध्वस्त सड़कें और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां इस काम को बेहद कठिन बना रही हैं। पहचान की प्रक्रिया भी धीमी है, क्योंकि कई शव बुरी तरह क्षतिग्रस्त हालत में मिल रहे हैं और डीएनए टेस्टिंग जैसी प्रक्रियाओं में समय लगता है।
दूसरी बड़ी चुनौती है बुनियादी ढांचे की मरम्मत। जब तक सड़कें और पुल दोबारा नहीं बनते, तब तक प्रभावित क्षेत्रों तक राहत सामग्री पहुंचाना और लोगों को निकालना कठिन बना रहेगा। इसके अलावा, हजारों परिवार जिनके प्रियजन लापता हैं, वे मानसिक और भावनात्मक रूप से भी टूट चुके हैं। ऐसे में भारत और नेपाल दोनों सरकारों के लिए जरूरी है कि वे परिवारों को नियमित और सटीक जानकारी उपलब्ध कराएं, ताकि अफवाहों और भ्रम की स्थिति से बचा जा सके।
नेपाल की यह भीषण बाढ़ एक बार फिर यह याद दिलाती है कि हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में जलवायु परिवर्तन का असर कितना विनाशकारी हो सकता है। कोलकाता के 32 सदस्यीय दल की लापता होने की खबर हो, या मुंबई और महाराष्ट्र के उन दर्जनों श्रद्धालुओं की कहानी जो महीनों की तैयारी के बाद इस पवित्र यात्रा पर निकले थे — यह त्रासदी हर भारतीय परिवार के दिल को छू गई है। तपती सिन्हा जैसी कहानियां किस्मत के अजीब खेल को दिखाती हैं, तो वहीं हजारों परिवार अब भी अपने प्रियजनों की खैरियत की खबर का इंतजार कर रहे हैं।
आने वाले दिनों में जैसे-जैसे बचाव अभियान आगे बढ़ेगा और मलबा हटाया जाएगा, उम्मीद है कि लापता लोगों के बारे में और स्पष्ट जानकारी सामने आएगी। तब तक, पूरा देश इन प्रभावित परिवारों के साथ खड़ा है और उम्मीद कर रहा है कि जल्द ही कोई शुभ समाचार मिले। यह घटना भविष्य में तीर्थयात्रा मार्गों की सुरक्षा, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली और हिमालयी क्षेत्र में जलवायु निगरानी को लेकर एक गंभीर सबक भी है — ताकि आने वाले समय में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके या कम से कम उनके असर को कम किया जा सके।
नोट: यह एक विकसित हो रही खबर है और मृतकों व लापता लोगों की संख्या में लगातार बदलाव हो रहा है। ताजा और पुष्टि की गई जानकारी के लिए कृपया आधिकारिक स्रोतों और समाचार एजेंसियों से जुड़े रहें।
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