भारतीय शेयर बाजार(Share Market) में लगातार 7वें हफ्ते गिरावट, सेंसेक्स-निफ्टी टूटे। जानें गिरावट की वजहें, FII बिकवाली का असर और निवेशकों के लिए आगे की रणनीति।

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शेयर बाजार(Share Market) में हावी ‘लाल’ निशान! 7 हफ्तों से जारी है गिरावट का सिलसिला, निवेशकों के छूटे पसीने
भारतीय शेयर बाजार इस समय एक लंबी और थकाने वाली गिरावट के दौर से गुजर रहा है। बीते शुक्रवार को खत्म हुए कारोबारी हफ्ते के साथ ही बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी लगातार सातवें हफ्ते लाल निशान में बंद हुए। यह सिलसिला निवेशकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है, क्योंकि इतने लंबे समय तक चलने वाली गिरावट पिछले कई सालों में नहीं देखी गई थी। कुछ रिपोर्ट्स तो यहां तक बता रही हैं कि यह गिरावट बीते छह साल का रिकॉर्ड तोड़ चुकी है, और कुछ विश्लेषकों के मुताबिक इसकी तुलना 2008 की वैश्विक मंदी के दौर से भी की जा रही है।
आखिर क्यों बाजार लगातार दबाव में है, कौन-कौन से कारक इसके पीछे जिम्मेदार हैं, और आम निवेशकों को अब क्या रणनीति अपनानी चाहिए — इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से समझते हैं।
हफ्ते भर का हाल: कैसा रहा बाजार का प्रदर्शन
25 सितंबर को खत्म हुए कारोबारी हफ्ते में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में गिरावट दर्ज की गई। साप्ताहिक आधार पर निफ्टी करीब 0.88 प्रतिशत तक कमजोर हुआ। हालांकि हफ्ते के आखिरी दिन यानी शुक्रवार को बाजार ने कुछ राहत की सांस ली — सेंसेक्स 315 अंक यानी करीब 0.43 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ। लेकिन पूरे हफ्ते के हिसाब से देखा जाए तो यह बढ़त गिरावट की भरपाई करने के लिए काफी नहीं थी।
इससे पहले गुरुवार का दिन बाजार के लिए बेहद कमजोर रहा, जब दोनों प्रमुख सूचकांक करीब 1.6 प्रतिशत से ज्यादा टूट गए थे। शुक्रवार को चुनिंदा शेयरों में हुई वैल्यू बाइंग की वजह से बाजार को कुछ सहारा मिला और सीमित रिकवरी देखने को मिली, लेकिन कुल मिलाकर सप्ताह का ट्रेंड नकारात्मक ही रहा।
सिलसिला कब से शुरू हुआ
आंकड़ों पर गौर करें तो यह गिरावट का दौर करीब अगस्त की शुरुआत से चला आ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 3 अगस्त 2026 से अब तक बाजार में लगातार गिरावट जारी है और इस दौरान बेंचमार्क सूचकांकों में करीब 5 से 6 प्रतिशत तक की कमजोरी दर्ज की जा चुकी है। यही वजह है कि विश्लेषक इसे बीते कई सालों की सबसे लंबी और गहरी गिरावटों में गिन रहे हैं।
इतने लंबे समय तक लगातार बाजार का नीचे जाना जाहिर तौर पर छोटे और मझोले निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जो निवेशक हाल के महीनों में नई पोजीशन बनाकर बाजार में उतरे थे, उनके पोर्टफोलियो पर इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है।
गिरावट के पीछे की बड़ी वजहें
बाजार में जारी इस लगातार कमजोरी के पीछे एक-दो नहीं बल्कि कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं। आइए इन्हें बारी-बारी से समझते हैं।
1. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता ने तेल की कीमतों को सहारा दिया, जिससे भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए चिंताएं बढ़ गईं। ऊंची तेल कीमतों का सीधा असर आयात बिल, महंगाई, रुपए की कीमत और कंपनियों की उत्पादन लागत पर पड़ता है — और यही वजह है कि इसका असर सीधे शेयर बाजार पर भी दिखा। हालांकि हफ्ते के आखिर में तेल कीमतों में हल्की नरमी जरूर देखने को मिली, जिससे कुछ राहत मिली।
2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी
अमेरिका में 10 साल के बॉन्ड यील्ड में हुई बढ़ोतरी भी बिकवाली की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। जब अमेरिकी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तो वैश्विक निवेशकों के लिए वहां निवेश करना अपेक्षाकृत सुरक्षित और आकर्षक हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि उभरते बाजारों, जिनमें भारत भी शामिल है, से पूंजी बाहर निकलने लगती है।
3. विदेशी निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली
विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की लगातार बिकवाली ने भी बाजार पर दबाव बनाए रखा। सितंबर महीने में अब तक FII बड़े पैमाने पर भारतीय बाजार से पैसा निकाल चुके हैं। जब बड़े विदेशी निवेशक लगातार शेयर बेचते हैं, तो इसका सीधा असर सूचकांकों पर दिखता है, खासकर उन सेक्टर्स में जहां विदेशी निवेश का हिस्सा ज्यादा होता है।
4. घरेलू निवेशकों का सहारा
हालांकि एक राहत की बात यह रही कि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने अपनी खरीदारी का सिलसिला जारी रखा। इस हफ्ते DII ने करीब 16,398 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश किया, जिसकी वजह से बाजार की गिरावट कुछ हद तक सीमित रह सकी। अगर घरेलू निवेशकों का यह सहारा न मिलता, तो गिरावट और गहरी हो सकती थी।
क्यों खास है यह गिरावट का दौर
बाजार में गिरावट आना कोई नई बात नहीं है — शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव उसकी प्रकृति का हिस्सा है। लेकिन इस बार जो चीज खास है, वह है गिरावट की अवधि। लगातार सात हफ्तों तक बाजार का नीचे जाना एक असामान्य स्थिति है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक यह बीते छह साल की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है, जबकि कुछ विश्लेषक इसकी तुलना 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर से भी कर रहे हैं, जब बाजार में लंबे समय तक भारी बिकवाली देखने को मिली थी।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो इससे पहले 2012 में अप्रैल से मई के बीच बाजार में लगातार छह हफ्तों तक गिरावट आई थी, जिसमें बाजार करीब 8.2 प्रतिशत तक टूटा था। मौजूदा गिरावट का सिलसिला उस दौर से भी लंबा खिंच चुका है, जो इस बात का संकेत है कि निवेशकों की चिंता क्यों बढ़ी हुई है।
निवेशकों पर क्या पड़ रहा है असर
लगातार गिरावट का सबसे सीधा असर निवेशकों के पोर्टफोलियो की वैल्यू पर पड़ता है। जिन निवेशकों ने हाल के महीनों में ऊंचे स्तर पर शेयर खरीदे थे, उनके लिए यह दौर मानसिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। बाजार में लगातार लाल निशान देखकर घबराहट में जल्दबाजी में फैसले लेना आम बात हो जाती है, लेकिन विशेषज्ञ बार-बार यही सलाह देते हैं कि पैनिक में आकर निर्णय लेने से बचना चाहिए।
म्यूचुअल फंड के जरिए SIP करने वाले निवेशकों के लिए हालांकि यह दौर अलग तरह से देखा जाना चाहिए। बाजार में गिरावट के दौरान SIP जारी रखने से निवेशकों को कम कीमत पर ज्यादा यूनिट्स खरीदने का मौका मिलता है, जिसे रुपी कॉस्ट एवरेजिंग कहा जाता है। लंबी अवधि में यह रणनीति फायदेमंद साबित हो सकती है, बशर्ते निवेशक धैर्य बनाए रखें।
आगे किन बातों पर रखनी होगी नजर
बाजार में आगे की दिशा तय करने में कुछ अहम कारक भूमिका निभाएंगे:
- कच्चे तेल की कीमतें: अगर तेल की कीमतों में और नरमी आती है, तो यह बाजार के लिए राहत भरा संकेत हो सकता है। वहीं भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने की स्थिति में तेल कीमतों में फिर उछाल आ सकता है, जिससे दबाव बढ़ेगा।
- अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और फेड की नीति: अमेरिका में ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड की दिशा पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी। इसका सीधा असर वैश्विक पूंजी प्रवाह पर पड़ता है।
- FII का रुख: विदेशी निवेशकों की बिकवाली अगर थमती है या पलटकर खरीदारी में बदलती है, तो बाजार को बड़ा सहारा मिल सकता है।
- कॉरपोरेट नतीजे और घरेलू आर्थिक आंकड़े: आने वाली तिमाही के नतीजे और महंगाई, GDP जैसे आर्थिक आंकड़े भी बाजार की चाल तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
- रुपए की चाल: तेल की ऊंची कीमतों और FII आउटफ्लो का असर रुपए पर भी पड़ता है, और कमजोर रुपया महंगाई और आयात लागत के जरिए बाजार पर परोक्ष असर डालता है।
निवेशकों के लिए जरूरी सुझाव
ऐसे माहौल में जब बाजार लगातार दबाव में हो, निवेशकों के लिए कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है:
- घबराहट में बिकवाली से बचें: बाजार में अस्थायी गिरावट को देखकर पैनिक में शेयर या फंड बेचना अक्सर नुकसानदेह साबित होता है।
- पोर्टफोलियो की समीक्षा करें: यह सही समय है अपने निवेश की समीक्षा करने का, ताकि यह देखा जा सके कि पोर्टफोलियो में जोखिम का स्तर आपकी क्षमता के अनुरूप है या नहीं।
- लंबी अवधि का नजरिया रखें: शेयर बाजार का इतिहास बताता है कि गिरावट के दौर के बाद रिकवरी भी आती है। जो निवेशक लंबी अवधि के लक्ष्य के साथ निवेश करते हैं, उनके लिए ऐसी गिरावटें अक्सर अस्थायी साबित होती हैं।
- क्वालिटी शेयरों और फंड्स पर फोकस करें: मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों और अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड वाले फंड्स में निवेश बनाए रखना बेहतर रणनीति मानी जाती है।
- किसी वित्तीय सलाहकार से सलाह लें: अपनी व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति और जोखिम क्षमता के हिसाब से फैसला लेने के लिए योग्य सलाहकार की मदद लेना उचित रहता है।
भारतीय शेयर बाजार इस समय एक असामान्य रूप से लंबी गिरावट के दौर से गुजर रहा है, जिसने बीते कई सालों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली इस गिरावट के पीछे प्रमुख कारण रहे हैं, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने बाजार को कुछ हद तक संभाले रखा है।
आने वाले दिनों में बाजार की दिशा वैश्विक और घरेलू, दोनों तरह के कारकों पर निर्भर करेगी। ऐसे माहौल में निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है धैर्य बनाए रखना, जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना और अपने वित्तीय लक्ष्यों पर टिके रहना। बाजार के उतार-चढ़ाव लंबी अवधि के निवेश का स्वाभाविक हिस्सा हैं, और अनुशासित रणनीति ही ऐसे दौर में सबसे बड़ा सहारा साबित होती है।
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