हर घर तिरंगा (Har ghar tiranga) कर्नाटक मंत्री प्रियांक खरगे ने RSS पर निशाना साधते हुए पूछा कि नागपुर मुख्यालय में तिरंगा फहराने में 52 साल क्यों लगे। जानें पूरा विवाद, RSS की प्रतिक्रिया और राजनीतिक पृष्ठभूमि।

Table of Contents
Table of Contents
प्रियांक खरगे का RSS पर निशाना: ‘हर घर तिरंगा’ अभियान और तिरंगे को लेकर सवाल
देश जब ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत आज़ादी के जश्न की तैयारियों में जुटा है, ठीक उसी समय कर्नाटक सरकार में मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला बोला है। 13 अगस्त 2026 को प्रियांक खरगे ने सोशल मीडिया मंच X पर एक पोस्ट लिखकर सवाल उठाया कि जब RSS ने ही अपने मुख्यालय पर दशकों तक तिरंगा नहीं फहराया, तो बीजेपी को अपना ‘हर घर तिरंगा’ अभियान RSS के नागपुर स्थित मुख्यालय से शुरू करना चाहिए। यह कोई इक्का-दुक्का बयान नहीं है,
बल्कि पिछले कुछ हफ्तों से चल रहे एक बड़े राजनीतिक विवाद की अगली कड़ी है, जिसमें प्रियांक खरगे लगातार RSS की पारदर्शिता, इतिहास और राष्ट्रवाद के दावों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। प्रियांक खरगे के ताज़ा बयान से लेकर, इससे पहले के आरोपों, RSS की प्रतिक्रिया, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इस राजनीतिक टकराव के व्यापक संदर्भ तक।
प्रियांक खरगे का ताज़ा बयान: 13 अगस्त 2026
बेंगलुरु से जारी अपने बयान में प्रियांक खरगे ने X पर लिखा — “बीजेपी को अपना #HarGharTiranga अभियान RSS मुख्यालय से शुरू करना चाहिए। आज़ादी के बाद पांच दशकों से ज़्यादा समय तक RSS ने अपने नागपुर मुख्यालय में राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया। तिरंगा आधिकारिक रूप से केवल 2002 में फहराया गया।”
उन्होंने आगे लिखा कि हर भारतीय को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने से पहले बीजेपी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसके “वैचारिक जनक” यानी RSS ने तिरंगे की जगह भगवा ध्वज को क्यों चुना, और आख़िर इतने लंबे समय तक उसके अपने मुख्यालय में राष्ट्रीय ध्वज क्यों नहीं फहराया गया। खरगे ने एक तीखा सवाल भी दागा — “कभी आपने RSS की किसी पथ संचलन (route march) में स्वयंसेवकों को पूरी वर्दी में गर्व से तिरंगा लहराते हुए देखा है? नहीं। और यही लोग हर किसी को ‘देशभक्त’ का सर्टिफिकेट बांटते फिरते हैं।”
‘हर घर तिरंगा’ अभियान, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के तहत शुरू किया था, हर साल स्वतंत्रता दिवस से पहले नागरिकों को अपने घरों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने और तिरंगे से एक व्यक्तिगत जुड़ाव महसूस करने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह अभियान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद करने का भी एक ज़रिया माना जाता है। प्रियांक खरगे का यह बयान ठीक उस समय आया है जब देशभर में स्वतंत्रता दिवस से पहले यह अभियान अपने चरम पर है।
पृष्ठभूमि: जुलाई 2026 का बड़ा आरोप
प्रियांक खरगे का यह ताज़ा हमला अचानक नहीं आया। इससे लगभग दो हफ्ते पहले, 28 जुलाई 2026 को दिल्ली में आयोजित एक कॉन्क्लेव — जिसका विषय था “RSS की जनगणना क्यों ज़रूरी है?” — में प्रियांक खरगे ने इससे भी कहीं ज़्यादा विस्तृत और तीखा आरोप लगाया था।
उन्होंने दावा किया कि RSS ने संविधान और तिरंगे, दोनों को नकारा है। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने इतिहास का हवाला दिया — उनके अनुसार, 1929 में जब पूरे देश ने एक स्वर में तय किया था कि 26 जनवरी 1930 को तिरंगा फहराया जाएगा, तब RSS एकमात्र ऐसा संगठन था जिसने इससे असहमति जताई। खरगे के मुताबिक, RSS के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने आदेश जारी किया था कि 26 जनवरी 1930 को तिरंगा नहीं, बल्कि 21 जनवरी 1930 को हर RSS शाखा में “राष्ट्रीय ध्वज” के रूप में भगवा झंडा फहराया जाएगा।
खरगे ने यह भी दावा किया कि RSS के किसी पुराने दस्तावेज़ में यह कहा गया था कि भले ही सत्ता में आए लोग तिरंगा हाथ में थमा दें, लेकिन यह संगठन इसे कभी अपना नहीं मानेगा, और तीन रंगों वाला झंडा मनोवैज्ञानिक रूप से देश के लिए नुकसानदेह साबित होगा। उन्होंने दोहराया कि 52 वर्षों तक RSS मुख्यालय में तिरंगा नहीं फहराया गया, और यह तभी संभव हुआ जब 2002 में अदालत का आदेश आया। खरगे ने यह भी आरोप लगाया कि RSS ने संविधान की जगह मनुस्मृति को अपनाने की वकालत की थी, और सवाल उठाया कि जो संगठन तिरंगे और संविधान का सम्मान नहीं करता, वह आम जनता का सम्मान कैसे करेगा।

जून 2026: पारदर्शिता को लेकर खुला पत्र और ‘रजिस्ट्रेशन विवाद’
इस पूरे प्रकरण की जड़ें जून 2026 तक जाती हैं, जब प्रियांक खरगे ने RSS प्रमुख मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने RSS से उसकी कानूनी स्थिति, पंजीकरण, वित्तीय पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। खरगे का तर्क था कि जब RSS खुद को दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बताता है और उसकी हज़ारों शाखाएं तथा करोड़ों स्वयंसेवक हैं, तो उसे पारदर्शिता के उच्चतम मानकों पर खरा उतरना चाहिए।
पत्र में उन्होंने RSS से उसकी कानूनी संरचना, पदाधिकारियों, दान और आय के स्रोतों, खर्च व संपत्तियों, कर अनुपालन (टैक्स कम्प्लायंस), और बिना औपचारिक पंजीकरण के गतिविधियां चलाने के कानूनी आधार पर जानकारी मांगी थी। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि RSS “गुरु दक्षिणा” के रूप में मिलने वाले दान का हिसाब क्यों नहीं देता।
RSS ने इस मांग को बड़े पैमाने पर नज़रअंदाज़ कर दिया। RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि उन्हें खरगे के इस पत्र का जवाब देने की कोई ज़रूरत नज़र नहीं आती। दूसरी ओर, इसे “राजनीतिक स्टंट” (political gimmick) करार देते हुए RSS नेतृत्व ने कहा कि संगठन बिना किसी सरकारी निगरानी या औपचारिक पंजीकरण के एक सदी से भी ज़्यादा समय से सफलतापूर्वक काम कर रहा है।
25 जून 2026 को प्रियांक खरगे ने इसी सिलसिले में एक और तीखा बयान दिया, जिसमें उन्होंने बीजेपी को RSS का “यंत्र” (instrument) बताया। उन्होंने कहा कि जब भी RSS से सवाल पूछे जाते हैं, बीजेपी अपना आपा खो देती है और “फुफकारने” (hisses back) लगती है। उन्होंने यह भी कहा कि RSS स्वतंत्रता संग्राम में योगदान न देने के बावजूद आज पूरे देश को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहा है, और पूछा कि नागपुर मुख्यालय में तिरंगा फहराने में 52 साल क्यों लगे। खरगे का कहना था — “RSS को हिलाओ, बीजेपी फुफकारती है। हर हिलाना बस यही साबित करता है कि पूंछ किसके हाथ में है।”
तिरंगे के इतिहास से जुड़ा दावा: क्या कहता है सच?
प्रियांक खरगे और कांग्रेस के अन्य नेताओं का यह दावा नया नहीं है, बल्कि यह पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की राजनीतिक बहसबाज़ी का हिस्सा रहा है। 2022 में जब पीएम मोदी ने पहली बार ‘हर घर तिरंगा’ अभियान शुरू किया था, तभी कांग्रेस नेताओं ने यही सवाल उठाए थे। उस समय कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने RSS और मोहन भागवत की प्रोफाइल फोटो के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा था — “संघ वालों, अब तो तिरंगे को अपना लो।” वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी उस समय कहा था कि जिन लोगों ने अपने नागपुर मुख्यालय में 52 साल तक झंडा नहीं फहराया, क्या वे अब प्रधानमंत्री की बात मानेंगे।
यानी यह आरोप — कि RSS मुख्यालय में दशकों तक तिरंगा नहीं फहराया गया और यह 2002 में एक अदालती आदेश के बाद ही संभव हुआ — कांग्रेस पार्टी लंबे समय से दोहराती आ रही है। यह ध्यान रहे कि यह दावा कांग्रेस और प्रियांक खरगे के पक्ष से प्रस्तुत किया गया एक राजनीतिक आरोप है। इन खबरों में RSS या बीजेपी की ओर से इस विशिष्ट ऐतिहासिक दावे (52 वर्ष और 2002 का कोर्ट आदेश) का सीधा खंडन सामने नहीं आया है, हालांकि RSS नेतृत्व ने समग्र रूप से खरगे के आरोपों और पारदर्शिता संबंधी मांगों को “राजनीतिक गिमिक” बताते हुए खारिज किया है।
RSS और बीजेपी की प्रतिक्रिया
जहां तक RSS और बीजेपी की प्रतिक्रिया का सवाल है, दोनों पक्षों ने अलग-अलग तरीकों से जवाब दिया है:
- RSS प्रमुख मोहन भागवत ने खरगे के खुले पत्र और पारदर्शिता की मांगों पर सीधे जवाब देने से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा करने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती।
- RSS नेतृत्व ने कुल मिलाकर इन मांगों को “राजनीतिक स्टंट” बताया और कहा कि संगठन बिना औपचारिक पंजीकरण या सरकारी निगरानी के सौ साल से ज़्यादा समय से सफलतापूर्वक काम कर रहा है।
- प्रियांक खरगे के अनुसार, जब भी RSS से जुड़े सवाल उठते हैं, बीजेपी की प्रतिक्रिया आक्रामक हो जाती है — यही उनका मुख्य आरोप है कि इससे दोनों संगठनों के बीच घनिष्ठ रिश्ते की पुष्टि होती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि प्रियांक खरगे ने खुद कहा है कि अगर RSS उनके सवालों का प्रामाणिक दस्तावेज़ी सबूतों के साथ स्पष्ट जवाब देती है, तो वे माफी मांगने को तैयार हैं। इससे साफ है कि यह विवाद केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग जैसे बड़े राजनीतिक मुद्दे से भी जुड़ा हुआ है।
व्यापक राजनीतिक संदर्भ
यह पूरा विवाद ऐसे समय हो रहा है जब RSS अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है, और कांग्रेस लगातार इसे एक अवसर के रूप में देख रही है ताकि संगठन की पारदर्शिता, इतिहास और राष्ट्रवाद के दावों पर सवाल उठाए जा सकें। ‘हर घर तिरंगा’ जैसे राष्ट्रीय अभियानों को कांग्रेस बार-बार इस बहस से जोड़ती रही है, यह तर्क देते हुए कि जिन संगठनों का दशकों तक तिरंगे से सीधा जुड़ाव नहीं रहा, वे अब देशभक्ति की परिभाषा तय करने की कोशिश कर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की राजनीति सिर्फ कांग्रेस-बीजेपी-RSS के दायरे तक सीमित नहीं रही। 2022 में जब यह अभियान शुरू हुआ था, तब जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी बीजेपी पर तिरंगे के “राजनीतिकरण” और लोगों को झंडा खरीदने व फहराने के लिए “मजबूर” करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि तिरंगा सिर्फ एक झंडा नहीं, बल्कि कांग्रेस सहित तमाम भारतीयों के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है, और बीजेपी ने इसे “हाईजैक” कर लिया है, मानो पहले भारतीय इस झंडे का सम्मान ही नहीं करते थे।
यह दिखाता है कि ‘हर घर तिरंगा’ जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े अभियान भारतीय राजनीति में हमेशा से वैचारिक टकराव का विषय बनते रहे हैं — चाहे वह कांग्रेस बनाम RSS/बीजेपी की बहस हो, या क्षेत्रीय दलों की अपनी अलग राजनीतिक चिंताएं।
प्रियांक खरगे का 13 अगस्त 2026 का ताज़ा बयान दरअसल पिछले कई महीनों से चल रहे एक बड़े राजनीतिक टकराव की अगली कड़ी है, जो जून 2026 में RSS को लिखे उनके खुले पत्र से शुरू होकर, जुलाई में दिल्ली कॉन्क्लेव में विस्तृत ऐतिहासिक आरोपों से होते हुए, अब ‘हर घर तिरंगा’ अभियान तक पहुंच चुका है। इसके केंद्र में तीन बड़े सवाल हैं — RSS की पारदर्शिता और पंजीकरण, तिरंगे के प्रति उसका ऐतिहासिक रवैया, और स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका।
यह एक विशुद्ध राजनीतिक बहस है, जिसमें कांग्रेस अपनी बात मज़बूती से रख रही है, जबकि RSS और बीजेपी ने ज़्यादातर मामलों में सीधा जवाब देने के बजाय इन आरोपों को खारिज करने या अनदेखा करने का रास्ता चुना है। स्वतंत्रता दिवस नज़दीक आते ही यह उम्मीद की जा सकती है कि यह बहस और तेज़ होगी, क्योंकि दोनों पक्ष राष्ट्रवाद और देशभक्ति के प्रतीकों को अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव में ढालने की कोशिश करते रहेंगे।
यह लेख विभिन्न समाचार स्रोतों पर आधारित है और अगस्त 2026 तक उपलब्ध जानकारी को दर्शाता है। इसमें प्रस्तुत दावे संबंधित राजनीतिक नेताओं के बयानों पर आधारित हैं।