परिषदीय(Parishadiya )स्कूलों में अब बाहरी व्यक्तियों को बिना अनुमति प्रवेश नहीं मिलेगा, लेकिन अभिभावक और SMC सदस्य पहले की तरह जानकारी ले सकेंगे। जानें नए नियम, वजह और पूरी प्रक्रिया।

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परिषदीय(parishadiya) विद्यालयों में बाहरी लोगों के प्रवेश नियम बदले: अभिभावक, एसएमसी सदस्य और ग्रामीण अब जानकारी ले सकेंगे
परिषदीय विद्यालयों में बाहरी लोगों के प्रवेश पर नई रोक,उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में परिषदीय (सरकारी बेसिक) विद्यालयों की व्यवस्था को लेकर पिछले कुछ हफ्तों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। शिक्षा विभाग ने स्कूल परिसरों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश को लेकर सख्त नियम लागू किए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बनी है वह प्रवृत्ति, जिसमें कुछ यू-ट्यूबर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बिना किसी अनुमति के स्कूलों में घुसकर शिक्षकों और बच्चों के वीडियो बनाते और उन्हें सार्वजनिक मंचों पर साझा करते रहे हैं। इससे न केवल स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई का माहौल बाधित हो रहा था, बल्कि शिक्षकों की गरिमा और विभाग की छवि पर भी सवाल खड़े हो रहे थे।
लेकिन इस पूरे मामले में एक अहम पहलू यह है कि नए नियम केवल अनधिकृत और असंबंधित लोगों की एंट्री रोकने के लिए बनाए गए हैं — अभिभावकों, विद्यालय प्रबंध समिति (एसएमसी) के सदस्यों और स्थानीय ग्रामीणों को स्कूल की जानकारी लेने और निगरानी करने के उनके वैध अधिकार से वंचित नहीं किया गया है। यानी एक तरफ जहां अनुशासन कड़ा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ समुदाय की भागीदारी को और मजबूत किया गया है। इस ब्लॉग में हम इस पूरे बदलाव को विस्तार से समझेंगे — नए नियम क्या हैं, ये क्यों लाए गए, किन जिलों में लागू हुए, अभिभावकों और एसएमसी सदस्यों की भूमिका क्या रहेगी, और आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है।
नए प्रवेश नियम आखिर हैं क्या?
बीते कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश के कई जिलों — आजमगढ़, बलिया, शामली, अयोध्या, मैनपुरी जैसे जिलों — के बेसिक शिक्षा अधिकारियों (बीएसए) ने अपने-अपने जिलों में यह आदेश जारी किया है कि परिषदीय विद्यालयों में किसी भी बाहरी व्यक्ति को बिना अनुमति प्रवेश नहीं दिया जाएगा। इन आदेशों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. पूर्व अनुमति अनिवार्य अब किसी भी बाहरी व्यक्ति को विद्यालय परिसर में प्रवेश करने से पहले संबंधित विद्यालय के प्रधानाध्यापक या सक्षम अधिकारी (जैसे बीएसए कार्यालय) से लिखित अनुमति लेनी होगी। बिना इस अनुमति के किसी को भी स्कूल परिसर में जाने की इजाजत नहीं होगी।
2. फोटो-वीडियोग्राफी पर रोक विद्यालय परिसर के भीतर बिना अनुमति फोटो या वीडियो बनाना अब पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह नियम खासतौर पर उन यू-ट्यूबर्स और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों पर लागू होता है, जो स्कूलों में जाकर बिना इजाजत रील या वीडियो बनाकर उन्हें विभिन्न प्लेटफार्मों पर साझा करते रहे हैं।
3. मुख्य गेट अनिवार्य रूप से बंद कई जिलों के आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि विद्यालय की छुट्टी होने के बाद मुख्य गेट को हर हाल में बंद रखा जाए, ताकि किसी भी अनधिकृत व्यक्ति का प्रवेश न हो सके। यह जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक और संबंधित स्टाफ की तय की गई है।
4. उल्लंघन पर कार्रवाई यदि कोई व्यक्ति नियमों की अनदेखी कर स्कूल परिसर में प्रवेश करता है या बिना अनुमति फोटो-वीडियो बनाता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही स्कूल प्रशासन को भी निर्देश दिया गया है कि वे इन नियमों का सख्ती से पालन कराएं।
आजमगढ़ के बीएसए राजीव पाठक ने इस संबंध में स्पष्ट किया है कि यह आदेश स्कूलों में मौजूद खामियों को छिपाने के इरादे से नहीं लाया गया है, बल्कि इसका मकसद बच्चों के लिए एक सुरक्षित और अनुशासित शैक्षिक वातावरण बनाए रखना है। उन्होंने यह भी कहा कि इस कदम का उद्देश्य किसी खास वर्ग, पत्रकार या मीडिया को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि स्कूलों को एक सुरक्षित जगह बनाए रखना है, जहां बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हो सकें।
यह नियम क्यों लाना पड़ा?
पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा था कि कुछ लोग, खासतौर पर सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर और यू-ट्यूबर, बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के सरकारी स्कूलों में पहुंच जाते थे। वे वहां की व्यवस्थाओं, शिक्षकों की उपस्थिति, मिड-डे मील की गुणवत्ता या कक्षाओं की स्थिति को लेकर वीडियो बनाते और उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल करते थे। कई बार इन वीडियो में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता था, जिससे संबंधित स्कूल और शिक्षकों की छवि को नुकसान पहुंचता था।
बलिया के बीएसए मनीष कुमार सिंह ने अपने आदेश में साफ कहा है कि इस तरह की गतिविधियों से विद्यालयों में संचालित पठन-पाठन की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इसी तरह शामली में भी विभाग ने कहा है कि ऐसी गतिविधियों से न केवल पढ़ाई का काम बाधित होता है, बल्कि शिक्षक पद की गरिमा और शिक्षा विभाग की सार्वजनिक छवि पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
अयोध्या के बीएसए लालचंद ने भी इसी तरह के सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा कि सरकारी स्कूलों के निरीक्षण और जांच के लिए पहले से ही शासन द्वारा अधिकृत अधिकारी नियुक्त हैं, जो समय-समय पर स्कूलों का दौरा कर व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए जरूरी कदम उठाते हैं। ऐसे में किसी भी आम नागरिक, ब्लॉगर या डिजिटल क्रिएटर द्वारा नियमों की अनदेखी करना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मैनपुरी में तो प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक एसोसिएशन ने भी इस मुद्दे पर आवाज उठाते हुए मांग की कि परिषदीय विद्यालयों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगाई जाए, क्योंकि इससे बच्चों की सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है और शैक्षणिक गतिविधियों में लगातार बाधा आती है।
अभिभावकों और एसएमसी सदस्यों को छूट क्यों?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझनी जरूरी है कि यह प्रतिबंध किसी भी तरह से अभिभावकों, विद्यालय प्रबंध समिति (एसएमसी) के सदस्यों या ग्रामीणों की वैध निगरानी और सूचना के अधिकार को सीमित नहीं करता। दरअसल, शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई एक्ट) 2009 की धारा 21 के तहत हर सरकारी स्कूल में एसएमसी का गठन अनिवार्य है, और इस समिति की भूमिका को हाल ही में और मजबूत किया गया है।
नई एसएमसी गाइडलाइंस के अनुसार, हर स्कूल की समिति में कम से कम 75 प्रतिशत सदस्य बच्चों के अभिभावकों या संरक्षकों में से होने चाहिए। इसके अलावा 50 प्रतिशत सदस्य महिलाएं होनी अनिवार्य हैं, और कमजोर व वंचित वर्ग के अभिभावकों को भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाता है। समिति का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी अभिभावक सदस्यों में से ही चुना जाता है, जिसमें कम से कम एक पद पर महिला का होना जरूरी है।
स्कूल में कुल छात्र संख्या के आधार पर समिति के सदस्यों की संख्या तय होती है — 100 छात्रों वाले स्कूल में 12-15 सदस्य, 100 से 500 छात्रों वाले स्कूल में 15-20 सदस्य, और 500 से अधिक छात्रों वाले स्कूल में 20-25 सदस्य रखे जाते हैं। यह समिति अब सिर्फ “जांच-पड़ताल” करने वाली संस्था नहीं रह गई है, बल्कि स्कूल के रोजमर्रा के संचालन, शिक्षा की गुणवत्ता, बच्चों के स्वास्थ्य, खेलकूद और स्कूल की जरूरतों पर सीधी नजर रखने वाली संस्था बन गई है।
इसके अलावा एसएमसी अब स्कूल के खर्चों की निगरानी भी करती है। समग्र शिक्षा के तहत मिलने वाली अनुदान राशि स्कूल के संयुक्त बचत खाते में जमा होती है, जिसका संचालन प्रधानाध्यापक और एसएमसी अध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षर से होता है। इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए डिजिटल व्यवस्था पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि हर अभिभावक को यह जानकारी रहे कि उनके बच्चे के स्कूल में कौन-कौन से सुधार कार्य हो रहे हैं और पैसा कहां खर्च हो रहा है।
इसी वजह से नए प्रवेश नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि यह प्रतिबंध केवल उन अनधिकृत बाहरी लोगों पर लागू होता है जो बिना किसी वैध कारण या पहचान के स्कूल परिसर में घुसकर वीडियो-फोटो बनाते हैं। अभिभावक और एसएमसी सदस्य, जो कानूनी रूप से स्कूल प्रबंधन का हिस्सा हैं, वे पहले की तरह स्कूल की व्यवस्थाओं, पढ़ाई की गुणवत्ता, मिड-डे मील और अन्य गतिविधियों की जानकारी ले सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सवाल भी उठा सकते हैं।
एसएमसी के पुनर्गठन की प्रक्रिया
इसी बदलाव की कड़ी में उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 नवंबर तक राज्य भर के परिषदीय और पीएमश्री विद्यालयों में नई विद्यालय प्रबंध समितियों के पुनर्गठन का भी निर्देश दिया है। यह प्रक्रिया एक नवंबर से शुरू होकर पूरी तरह पारदर्शी और लोकतांत्रिक तरीके से चलाई जाएगी।
इस प्रक्रिया के तहत हर विद्यालय में एक खुली बैठक आयोजित की जाएगी, जिसकी जानकारी पहले से ही अभिभावकों को दी जाएगी। समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव 11 अभिभावक सदस्यों में से लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा। यदि सर्वसम्मति नहीं बनती है तो हाथ उठाकर मतदान कराया जाएगा, और यदि इसमें भी विवाद हो तो संबंधित अधिकारी की देखरेख में गोपनीय मतदान (सीक्रेट बैलेट) की व्यवस्था की जाएगी। ध्यान रहे कि प्रधानाध्यापक, एएनएम, लेखपाल या स्थानीय निकाय के सदस्य अध्यक्ष या उपाध्यक्ष नहीं बन सकते — यह पद विशुद्ध रूप से अभिभावक सदस्यों के लिए ही आरक्षित है।
अंबेडकरनगर जैसे जिलों में यह प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो चुकी है, जहां जिले के 1,591 परिषदीय और 20 पीएमश्री विद्यालयों में नई एसएमसी बनाई जा रही है। हर समिति में 15 सदस्य होंगे, जिनमें 11 सदस्य विद्यार्थी-अभिभावक होंगे और महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी अनिवार्य रहेगी। साथ ही हर कक्षा का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का भी प्रयास किया जा रहा है, ताकि हर स्तर के बच्चों की जरूरतों की आवाज समिति तक पहुंच सके।
बाराबंकी जिले में भी इसी तरह की तैयारी चल रही है, जहां गांव के लोग खुद तय करेंगे कि स्कूल में पढ़ाई कैसी हो रही है और बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील की गुणवत्ता कैसी है। यहां भी 15 सदस्यीय समिति में 11 अभिभावक सदस्य चुने जाएंगे, जिनमें 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी और हर कक्षा का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा।
राजस्थान में भी उठा मुद्दा
यह मुद्दा सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहा। राजस्थान में भी हाल ही में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की एंट्री को लेकर एक आदेश जारी हुआ, जिसके बाद वहां राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के एक बयान के बाद यह मामला और गरमा गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्होंने सुना है कि सरकार ने स्कूलों में किसी के जाने और रिकॉर्डिंग करने पर प्रतिबंध लगाया है।
हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि स्कूलों में पूरी तरह से किसी के प्रवेश या रिकॉर्डिंग पर रोक नहीं लगाई गई है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और निजता को ध्यान में रखते हुए यह नियम बनाए गए हैं। माध्यमिक शिक्षा विभाग की ओर से 16-17 अगस्त को जारी आदेश में सरकारी विद्यालयों में बाहरी लोगों की गतिविधियों को लेकर कई दिशा-निर्देश दिए गए थे। इस आदेश के अनुसार भी किसी बाहरी व्यक्ति को स्कूल में प्रवेश करने के लिए संस्था प्रधान से पूर्व अनुमति लेनी होगी, और फोटो, वीडियो, इंटरव्यू या लाइव स्ट्रीमिंग जैसी गतिविधियों पर भी नियंत्रण रखा जाएगा।
यह दिखाता है कि यह बदलाव किसी एक राज्य विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में स्कूलों की सुरक्षा और अनुशासन को लेकर एक सामान्य प्रवृत्ति के रूप में उभर रहा है।
आम लोगों और अभिभावकों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस पूरे बदलाव को सरल शब्दों में समझें तो इसका असर दो अलग-अलग समूहों पर अलग-अलग तरह से पड़ेगा:
जो लोग स्कूल से जुड़े नहीं हैं — जैसे यू-ट्यूबर, ब्लॉगर, सामान्य नागरिक जिनका बच्चा उस स्कूल में नहीं पढ़ता — उन्हें अब स्कूल परिसर में जाने से पहले संबंधित प्रधानाध्यापक या बीएसए कार्यालय से लिखित अनुमति लेनी होगी। बिना अनुमति फोटो-वीडियो बनाना अब गंभीर उल्लंघन माना जाएगा और इस पर कार्रवाई हो सकती है।
जो लोग स्कूल प्रबंधन का वैध हिस्सा हैं — जैसे बच्चों के अभिभावक, एसएमसी सदस्य और ग्रामीण जो निगरानी समिति का हिस्सा हैं — उनके लिए स्कूल की जानकारी लेना, बैठकों में हिस्सा लेना, खर्च और गतिविधियों पर सवाल उठाना पहले की तरह ही जारी रहेगा। बल्कि नई एसएमसी गाइडलाइंस के जरिए उनकी भूमिका को और मजबूत किया गया है।
यानी सीधे शब्दों में कहें तो यह बदलाव पारदर्शिता को कम नहीं करता, बल्कि उसे सही दिशा में व्यवस्थित करने का प्रयास है। स्कूल की निगरानी और जवाबदेही अब असंगठित, यादृच्छिक वीडियोग्राफी के बजाय एक ढांचागत, कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त समिति के जरिए होगी, जिसमें खुद अभिभावक और स्थानीय समुदाय के लोग शामिल होंगे।
परिषदीय विद्यालयों में बाहरी लोगों के प्रवेश पर लगाई गई यह रोक एक संतुलित कदम है। एक तरफ यह स्कूलों को अनावश्यक हस्तक्षेप, गलत सूचना फैलाने वाली वीडियोग्राफी और शिक्षकों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचाती है, तो दूसरी तरफ यह अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को कमजोर नहीं करती, बल्कि एसएमसी के जरिए उसे और सशक्त बनाती है।
आने वाले महीनों में जैसे-जैसे नई एसएमसी का गठन पूरे राज्य में होगा, वैसे-वैसे अभिभावकों की भूमिका स्कूल प्रबंधन में और स्पष्ट और मजबूत होती जाएगी। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सरकार अनुशासन और पारदर्शिता — दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रही है, ताकि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का माहौल बेहतर हो और साथ ही समुदाय का भरोसा भी बना रहे।
अगर आपके क्षेत्र के स्कूल में एसएमसी का गठन अभी बाकी है, तो अभिभावक होने के नाते प्रधानाध्यापक या स्थानीय शिक्षा कार्यालय से इस बारे में जानकारी जरूर लें, ताकि आप भी अपने बच्चे के स्कूल के फैसलों में सक्रिय भागीदार बन सकें।
अगर आपके बच्चे के स्कूल में अभी तक SMC का गठन नहीं हुआ है, तो आज ही प्रधानाध्यापक या BSA कार्यालय से संपर्क करें और अपने बच्चे की शिक्षा से जुड़े फैसलों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
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