सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर दिशा सालियन (Disha Salian )मौत केस में बॉम्बे हाई कोर्ट ने CBI जांच का आदेश दिया। पूरी टाइमलाइन, आज का फैसला और न्याय में देरी के 5 बड़े कानूनी फैक्टर जानें।

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8 जून 2020 की रात मुंबई के मलाड इलाके में एक 28 साल की युवती एक ऊंची इमारत की 14वीं मंज़िल से गिरकर मौत के मुंह में समा गई। नाम था दिशा सालियन — बॉलीवुड की उभरती हुई टैलेंट मैनेजर, जो अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ काम कर चुकी थीं। पुलिस ने इसे एक्सिडेंटल डेथ रिपोर्ट (ADR) के तौर पर दर्ज किया। ठीक छह दिन बाद, 14 जून 2020 को सुशांत सिंह राजपूत अपने बांद्रा स्थित घर में मृत पाए गए। दो मौतें, महज़ छह दिनों का फासला, और एक-दूसरे से जुड़ा हुआ पेशेवर रिश्ता — इन तीन बातों ने मिलकर एक ऐसी गुत्थी खड़ी कर दी जिसने पूरे देश को छह साल तक उलझाए रखा।
आज, 2 सितंबर 2026 को, बॉम्बे हाई कोर्ट ने आखिरकार इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने का आदेश दे दिया। यह फैसला सिर्फ एक कानूनी घटनाक्रम भर नहीं है — यह भारतीय न्याय व्यवस्था में “देरी” नाम की बीमारी का एक जीता-जागता उदाहरण भी है। इस ब्लॉग में हम पूरी कहानी, कदम-दर-कदम टाइमलाइन, आज के फैसले के पीछे की कानूनी बारीकियां, और इस पूरे मामले के राजनीतिक आयामों को विस्तार से समझेंगे।
दिशा सालियन कौन थीं?
दिशा सालियन(Disha Salian ) फिल्म इंडस्ट्री में एक जाना-पहचाना नाम बन रही थीं। वे सेलिब्रिटी मैनेजमेंट के क्षेत्र में काम करती थीं और कुछ समय के लिए सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर भी रह चुकी थीं। उनकी मंगनी हाल ही में हुई थी और वे अपने करियर में एक नए मुकाम की तरफ बढ़ रही थीं। ऐसे में उनकी अचानक और रहस्यमयी मौत ने परिवार, दोस्तों और फिल्म इंडस्ट्री — सभी को स्तब्ध कर दिया था।
8 जून 2020 की रात: क्या हुआ था?
पुलिस के मुताबिक, दिशा सालियन एक पार्टी में शामिल हुई थीं और उसी रात मलाड की एक रिहायशी इमारत की 14वीं मंज़िल से गिर गईं। शुरुआती जांच में इसे आत्महत्या या दुर्घटनावश गिरना माना गया, और मुंबई पुलिस ने एक्सिडेंटल डेथ रिपोर्ट दर्ज कर दी। परिवार, खासकर उनके पिता सतीश सालियन, शुरू से ही इस निष्कर्ष से असंतुष्ट थे। उनका आरोप था कि पुलिस ने जांच को “जल्दबाज़ी” में निपटाया, फोरेंसिक सबूतों, चश्मदीदों के बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को नज़रअंदाज़ किया गया।
सुशांत सिंह राजपूत से जुड़ाव — शक की शुरुआत
जब छह दिन बाद सुशांत सिंह राजपूत की मौत हुई, तो दोनों घटनाओं के बीच के महीन धागे को जोड़ने की कोशिशें शुरू हो गईं। आरोप लगाया गया कि दोनों मार्च से अप्रैल 2020 के बीच संपर्क में थे और दस्तावेज़ी सबूत इस बात की पुष्टि करते हैं। सुशांत के दोस्त और जिम पार्टनर सुनील शुक्ला ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया और दलील दी कि दोनों मौतें “संदिग्ध परिस्थितियों” में हुई थीं, इसलिए जिस तरह सुशांत सिंह राजपूत केस CBI को सौंपा गया, उसी तरह सालियन केस भी CBI को सौंपा जाना चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने भी आरोप लगाया कि दोनों की हत्या हुई थी और एक महाराष्ट्र मंत्री की भूमिका पर सवाल उठाए। उस वक्त के मंत्री आदित्य ठाकरे ने इन दोनों घटनाओं से किसी भी संबंध से साफ इनकार किया। अभिनेता सूरज पंचोली ने भी दिशा सालियन की मौत से किसी भी जुड़ाव को खारिज किया था।
पूरी टाइमलाइन: छह साल का सफर
जून 2020 — दिशा सालियन की मौत, ADR दर्ज, छह दिन बाद सुशांत सिंह राजपूत की मौत। मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया।
अगस्त 2020 — केंद्र सरकार सुशांत सिंह राजपूत केस CBI को सौंपने पर सहमत हुई और CBI ने FIR दर्ज की। लेकिन दिशा सालियन केस उस वक्त CBI के दायरे में नहीं आया।
2020 के मध्य — याचिकाकर्ता पुनीत कौर धांडा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और दलील दी कि दोनों मौतें आपस में जुड़ी हैं क्योंकि दोनों अपने-अपने पेशे के शिखर पर “संदिग्ध परिस्थितियों” में मरे। 19 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने सुशांत सिंह राजपूत मामले में CBI जांच का आदेश दिया।
अक्टूबर 2020 — सुप्रीम कोर्ट ने दिशा सालियन केस में CBI जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को बॉम्बे हाई कोर्ट जाने को कहा, यह कहते हुए कि हाई कोर्ट पहले से ही इस मामले से परिचित है।
नवंबर 2020 — बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी याचिका की एक प्रति महाराष्ट्र सरकार को सौंपने का निर्देश दिया, जिसमें कोर्ट-निगरानी वाली CBI जांच की मांग की गई थी।
दिसंबर 2022 — तत्कालीन उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में घोषणा की कि दिशा सालियन केस की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला कभी CBI के पास नहीं गया था, इसलिए इसमें “क्लोजर” जैसी कोई बात नहीं है — यह भ्रम सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत केस को लेकर था।
2023 — इसी बीच बीजेपी नेता नितेश राणे और अन्य विधायकों ने विधानसभा में यह मुद्दा बार-बार उठाया और आदित्य ठाकरे को निशाना बनाते हुए CBI जांच की मांग दोहराई। शिवसेना (UBT) प्रवक्ता संजय राउत ने पलटवार करते हुए कहा कि जांच चाहे CBI करे या कोई और एजेंसी, कोई आपत्ति नहीं।
मार्च 2026 — सतीश सालियन ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक नई और विस्तृत याचिका दाखिल की। इसमें आरोप लगाया गया कि उनकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसकी हत्या की गई और इसके बाद एक राजनीतिक रूप से प्रेरित कवरअप हुआ। इस याचिका में आदित्य ठाकरे के खिलाफ FIR दर्ज करने और मामले को CBI को सौंपने की मांग की गई।
2026 (मध्य वर्ष) — जांच में हुई देरी पर हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। जस्टिस ए एस गडकरी और आर आर भोसले की बेंच ने पूछा कि मौत को पांच साल बीत चुके हैं, ऐसे में पुलिस को सिर्फ यह तय करना है कि यह आत्महत्या थी या हत्या — फिर इतनी देरी क्यों? सरकारी वकील ने जवाब दिया कि सभी संभावनाओं को खारिज करने के लिए जांच बारीकी से की जा रही है।
2026 में SIT रिपोर्ट — मुंबई पुलिस की SIT जांच के नतीजे पुराने निष्कर्षों जैसे ही रहे — जांच में किसी आपराधिक साजिश या फाउल-प्ले के सबूत नहीं मिले। सतीश सालियन ने इस रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मामले ने एक नया मोड़ लिया।
28 अगस्त 2026 — दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
2 सितंबर 2026 — बॉम्बे हाई कोर्ट ने आखिरकार CBI जांच का आदेश दे दिया।

आज का फैसला: कोर्ट ने क्या कहा?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिशा सालियन की मौत से जुड़े हालात की CBI जांच का आदेश देते हुए एक वरिष्ठ CBI अधिकारी को इस जांच की निगरानी के लिए नियुक्त करने का निर्देश दिया। यह आदेश सतीश सालियन की याचिका पर आया।
कोर्ट ने कुछ अहम बातें साफ कीं:
- याचिकाकर्ता (सतीश सालियन) का बयान जांच के हिस्से के रूप में दर्ज किया जाए।
- जब तक जांच में किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) का होना साबित नहीं होता, तब तक किसी भी व्यक्ति को आरोपी नहीं माना जाएगा।
- अगर जांच में कोई मामला नहीं बनता, तो याचिकाकर्ता के पास कानून के अनुसार अपील करने की स्वतंत्रता होगी।
परिवार के वकील निलेश ओझा ने मीडिया को बताया कि कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता का बयान दर्ज करे, FIR रजिस्टर करे, एक वरिष्ठ अधिकारी को जांच के लिए नियुक्त करे, और मलवणी पुलिस स्टेशन से जुड़े सभी रिकॉर्ड अपने कब्ज़े में ले। ओझा के मुताबिक कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि सबूत मिलने पर ही किसी के खिलाफ कार्रवाई होगी, और अगर CBI क्लोजर रिपोर्ट फाइल करती है तो परिवार को आपत्ति दर्ज कराने और प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने का अधिकार होगा।
सतीश सालियन ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह छह साल की लंबी लड़ाई रही है और उन्हें हमेशा से भरोसा था कि सच्चाई सामने आएगी।
न्याय में देरी की 5 बड़ी वजहें — कानूनी विश्लेषण
1. मामले का बार-बार अलग-अलग अदालतों में जाना
यह केस सीधे किसी एक अदालत में तय नहीं हुआ। पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल हुई, वहां से मामला बॉम्बे हाई कोर्ट भेजा गया। इस तरह “फोरम” (न्यायिक क्षेत्राधिकार) तय करने में ही समय बर्बाद हुआ। भारतीय न्याय व्यवस्था में यह एक आम समस्या है — जब कोई मामला संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल होता है, तो पक्षकार अलग-अलग अदालतों का रुख करते हैं, जिससे प्रक्रिया लंबी खिंचती जाती है।
2. शुरुआती जांच का “ADR” के रूप में सीमित रह जाना
पुलिस ने शुरू में इसे एक्सिडेंटल डेथ रिपोर्ट के तहत दर्ज किया — यानी एक साधारण, गैर-आपराधिक श्रेणी की जांच। जब तक कोई FIR दर्ज नहीं होती, तब तक आपराधिक जांच की पूरी मशीनरी (जैसे विस्तृत फोरेंसिक जांच, गिरफ्तारी के अधिकार, आदि) सक्रिय नहीं होती। परिवार का आरोप है कि यही शुरुआती वर्गीकरण जांच को कमज़ोर करने की वजह बना।
3. राजनीतिक रंग और सत्ता परिवर्तन का असर
छह साल के दौरान महाराष्ट्र में सरकार बदली — उद्धव ठाकरे सरकार, फिर एकनाथ शिंदे-देवेंद्र फडणवीस सरकार। हर सरकार के दौर में इस मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी होती रही। बीजेपी नेताओं ने बार-बार आदित्य ठाकरे को निशाना बनाते हुए CBI जांच की मांग की, तो शिवसेना (UBT) ने इसे राजनीतिक बदनामी की मुहिम बताया। जब कोई आपराधिक मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मैदान बन जाता है, तो निष्पक्ष और तेज़ जांच की राह और कठिन हो जाती है।
4. SIT जांच पर असंतोष और नए सिरे से याचिका
2022 में SIT बनाई गई, लेकिन उसके नतीजे पुराने निष्कर्षों जैसे ही निकले — कोई आपराधिक साजिश या फाउल-प्ले नहीं मिला। परिवार ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए मार्च 2026 में एक नई, अधिक विस्तृत याचिका दाखिल की। हर बार जब कोई जांच एजेंसी असंतोषजनक नतीजे देती है और पीड़ित पक्ष नई याचिका दाखिल करता है, तो प्रक्रिया शुरुआत से एक कदम और आगे खिंच जाती है।
5. कोर्ट की खुद की टिप्पणी — व्यवस्थागत सुस्ती का प्रमाण
शायद सबसे मजबूत सबूत खुद हाई कोर्ट की टिप्पणी है। जब बेंच ने यह कहा कि पांच साल बीतने के बाद भी पुलिस को सिर्फ यह तय करना बाकी है कि मौत आत्महत्या थी या हत्या, तो यह सीधे तौर पर जांच एजेंसी की सुस्ती की तरफ इशारा करता है। जब अदालत खुद जांच की गति पर सवाल उठाए, तो यह इस बात का पुख्ता प्रमाण बन जाता है कि देरी सिर्फ पीड़ित परिवार का आरोप नहीं, बल्कि एक वास्तविक व्यवस्थागत समस्या है।
क्या CBI जांच का आदेश किसी को दोषी ठहराता है?
नहीं। यह समझना बेहद ज़रूरी है कि CBI जांच का आदेश किसी भी व्यक्ति के अपराधी होने का प्रमाण नहीं है। कोर्ट ने खुद इस बात को स्पष्ट किया है कि जब तक जांच अधिकारी के पास पर्याप्त सबूत नहीं मिलते, तब तक किसी को आरोपी नहीं माना जाएगा। CBI जांच का मतलब सिर्फ इतना है कि मामले की एक निष्पक्ष, केंद्रीय एजेंसी द्वारा दोबारा और गहराई से पड़ताल होगी — यह न तो किसी को दोषमुक्त करता है और न ही किसी को दोषी।
इसके अलावा, अगर CBI आखिरकार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करती है (यानी मामले में कोई ठोस सबूत नहीं मिलता), तब भी परिवार के पास कानूनी विकल्प खुले रहेंगे — वे आपत्ति दर्ज करा सकते हैं और प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल कर सकते हैं। यह भारतीय आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत एक स्थापित प्रक्रिया है, जो सुनिश्चित करती है कि जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट भी न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होती।
राजनीतिक आयाम — क्यों यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं रहा
दिशा सालियन केस की शुरुआत से ही राजनीति इसमें गहराई से जुड़ी रही है। भाजपा नेताओं ने बार-बार इस मामले को उठाया और शिवसेना (UBT) के नेता आदित्य ठाकरे पर निशाना साधा, जबकि उद्धव गुट इसे राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने की कोशिश बताता रहा है। हाल ही में उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि जहां सुशांत सिंह राजपूत मामले की जांच CBI द्वारा पहले ही की जा चुकी है और उसमें एक कथित क्लोजर रिपोर्ट भी सामने आई थी, वहीं सालियन मामले की जांच निष्पक्ष तरीके से नए सबूतों के आधार पर की जाएगी। इसके जवाब में आदित्य ठाकरे ने कहा कि यह असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की एक और कोशिश है।
यह राजनीतिक खींचतान इस बात की भी मिसाल है कि कैसे हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामले अक्सर पार्टी राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे निष्पक्ष और तेज़ जांच पर भरोसा बनाए रखना और मुश्किल हो जाता है — चाहे असल जांच किसी भी दिशा में जाए।
आगे क्या होगा?
अब जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने CBI जांच का औपचारिक आदेश दे दिया है, अगले कदम इस प्रकार हो सकते हैं:
- FIR दर्ज होना — CBI को याचिका में उठाए गए आरोपों के आधार पर औपचारिक रूप से FIR दर्ज करनी होगी।
- रिकॉर्ड का हस्तांतरण — मलवणी पुलिस स्टेशन से जुड़ी सभी फाइलें, फोरेंसिक रिपोर्ट्स और पुराने बयान CBI को सौंपे जाएंगे।
- बयान दर्ज करना — सतीश सालियन सहित अन्य गवाहों के बयान नए सिरे से दर्ज होंगे।
- तकनीकी और फोरेंसिक पुनर्परीक्षण — पुराने फोरेंसिक साक्ष्यों की समीक्षा जरूरी हो सकती है, क्योंकि इतने साल बीत जाने के बाद कुछ भौतिक साक्ष्य नष्ट भी हो सकते हैं।
- समयबद्ध जांच — देखना यह होगा कि क्या कोर्ट जांच के लिए कोई समयसीमा तय करता है, ताकि इतिहास खुद को न दोहराए।
दिशा सालियन केस भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक आईना है। एक 28 साल की युवती की मौत को छह साल से ज़्यादा हो चुके हैं, और अब जाकर एक केंद्रीय एजेंसी को औपचारिक रूप से जांच सौंपी गई है। इस बीच मामला अलग-अलग अदालतों, अलग-अलग सरकारों, राजनीतिक बयानबाज़ी और एक असंतोषजनक SIT रिपोर्ट के दौर से गुज़रा।
यह मामला यह भी सिखाता है कि जब कोई केस हाई-प्रोफाइल बन जाता है — जब उसमें फिल्म इंडस्ट्री, राजनीति और मीडिया तीनों जुड़ जाते हैं — तो अक्सर सच्चाई तक पहुंचने का रास्ता और लंबा हो जाता है, भले ही न्यायपालिका खुद इस देरी पर चिंता जताए। साथ ही, यह भी याद रखना ज़रूरी है कि CBI जांच का आदेश खुद में कोई फैसला नहीं है — यह सिर्फ एक निष्पक्ष जांच की शुरुआत है। असली न्याय तब मिलेगा जब जांच पूरी हो, सबूतों का विश्लेषण हो, और अदालत में एक ठोस निष्कर्ष सामने आए।
फिलहाल, सतीश सालियन और उनका परिवार छह साल के इंतज़ार के बाद उम्मीद की एक नई किरण देख रहे हैं। बाकी देश की तरह, अब हम सब भी यही इंतज़ार करेंगे कि CBI की जांच किस दिशा में जाती है, और क्या यह लंबा इंतज़ार आखिरकार सच्चाई तक पहुंचता है या नहीं।
नोट: यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और अदालती कार्यवाही की सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। जांच अभी शुरुआती चरण में है और किसी भी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप अभी अप्रमाणित हैं। भारतीय कानून के तहत जब तक दोष सिद्ध न हो, हर व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।
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