Modi केंद्रीय कैबिनेट ने दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-हावड़ा समेत 7 हाई-डेंसिटी रेलवे कॉरिडोर पर मल्टी-ट्रैकिंग को मंजूरी दी। जानें पूरी परियोजना, लागत, राज्य और फायदे की पूरी जानकारी।

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देश के 7 हाई-डेंसिटी रेलवे नेटवर्क को मिली फोर-लेनिंग की मंजूरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Modi)की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण को लेकर एक बड़ा और दूरगामी फैसला लिया गया। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने देश के सात सबसे व्यस्त यानी हाई-डेंसिटी रेलवे कॉरिडोर पर मल्टी-ट्रैकिंग यानी “फोर-लेनिंग” की परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। इन परियोजनाओं का मकसद देश के सबसे व्यस्त रेल मार्गों पर बढ़ती भीड़भाड़ को कम करना, मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों की क्षमता बढ़ाना और लॉजिस्टिक्स लागत को घटाना है। कैबिनेट बैठक के बाद मीडिया को जानकारी देते हुए केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस फैसले को पिछले 12 वर्षों से चल रहे रेलवे के “संपूर्ण कायाकल्प और आधुनिकीकरण” अभियान की एक अहम कड़ी बताया।
क्या है पूरा मामला?
भारतीय रेलवे नेटवर्क पर कुछ ऐसे मार्ग हैं जिन पर ट्रेनों का दबाव बाकी नेटवर्क की तुलना में कहीं ज्यादा है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, देश के सिर्फ सात प्रमुख कॉरिडोर मिलकर रेलवे के कुल यातायात का करीब 40 से 41 प्रतिशत हिस्सा वहन करते हैं। ये सात कॉरिडोर हैं:
- दिल्ली–मुंबई
- मुंबई–चेन्नई
- चेन्नई–कोलकाता
- कोलकाता–दिल्ली
- दिल्ली–हावड़ा
- दिल्ली–गुवाहाटी
- हावड़ा–चेन्नई
इन मार्गों पर वर्षों से डबल लाइन या इससे भी कम क्षमता वाली पटरियां मौजूद हैं, जबकि यातायात का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। नतीजा यह होता है कि मालगाड़ियों को अक्सर यात्री ट्रेनों को रास्ता देने के लिए घंटों रोका जाता है, जिससे माल ढुलाई में देरी होती है और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ जाती है। सरकार का कहना है कि इन कॉरिडोर पर पहले ही करीब 2,000 किलोमीटर हिस्से में फोर-लेनिंग यानी तीसरी-चौथी लाइन बिछाने का काम पूरा किया जा चुका है, और अब बाकी बचे हिस्सों को चरणबद्ध तरीके से पूरा करने की दिशा में यह ताजा मंजूरी दी गई है।
सीधी भाषा में समझें तो जैसे सड़कों पर ट्रैफिक जाम कम करने के लिए दो-लेन वाली सड़क को चार-लेन में बदला जाता है, ठीक वैसे ही रेलवे भी अपने सबसे व्यस्त मार्गों पर मौजूदा डबल लाइन के समांतर अतिरिक्त तीसरी और चौथी लाइन बिछा रहा है, ताकि मालगाड़ी और यात्री ट्रेनें बिना एक-दूसरे को रोके अलग-अलग ट्रैक पर तेज़ी से दौड़ सकें।
कैबिनेट ने किन परियोजनाओं को दी मंजूरी?
Modi railway project investment,बुधवार की बैठक में CCEA ने कुल आठ मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी, जिनकी संयुक्त अनुमानित लागत ₹20,804 करोड़ से अधिक है। ये परियोजनाएं देश के 9 राज्यों के 31 जिलों में फैली हैं और रेलवे नेटवर्क में करीब 1,196 किलोमीटर की अतिरिक्त लाइन जोड़ेंगी। इन सभी परियोजनाओं को 2029-30 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इन आठ परियोजनाओं को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है — पूर्वी व मध्य भारत की परियोजनाएं, और दक्षिण भारत की परियोजनाएं।
1. पूर्वी और मध्य भारत की तीन परियोजनाएं (₹10,783 करोड़)
इस हिस्से में तीन बड़ी मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनकी कुल लागत ₹10,783 करोड़ है। ये परियोजनाएं पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ — इन पांच राज्यों के 14 जिलों को कवर करेंगी और नेटवर्क में करीब 656 किलोमीटर जोड़ेंगी। इनमें शामिल हैं:
- खड़गपुर–झारसुगुड़ा (बगदेही) चौथी लाइन — यह मुंबई-हावड़ा मुख्य मार्ग का हिस्सा है और इसकी लंबाई करीब 367 किलोमीटर है। इस एक परियोजना को ही सबसे ज्यादा ₹6,528 करोड़ का आवंटन मिला है, क्योंकि यह मार्ग कोयला और अन्य भारी माल ढुलाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
- कटनी–पेंड्रा रोड चौथी लाइन
- बिलासपुर (उसलापुर)–पेंड्रा रोड तीसरी लाइन
रेल मंत्रालय के मुताबिक ये तीनों मार्ग कोयला, सीमेंट, लोहा और इस्पात जैसे भारी माल की ढुलाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और क्षमता बढ़ने से इन मार्गों पर अतिरिक्त 27 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) माल ढुलाई क्षमता जुड़ेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में इस फैसले की जानकारी साझा करते हुए कहा कि इससे छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में रेल संपर्क बेहतर होगा, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी।
2. दक्षिण भारत की पांच परियोजनाएं (₹10,021 करोड़)
दूसरे हिस्से में पांच परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है जिनकी लागत करीब ₹10,021 करोड़ है। ये परियोजनाएं मुख्यतः तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों के 17 जिलों को कवर करेंगी और नेटवर्क में करीब 540 किलोमीटर जोड़ेंगी। सरकार के मुताबिक इन परियोजनाओं से अरक्कोणम–रेनिगुंटा, व्हाइटफील्ड–बंगारपेट, होसुर–ओमलूर, सलेम–करूर–डिंडीगुल और सिकंदराबाद–काज़ीपेट जैसे मार्गों की क्षमता में इज़ाफा होगा। इन परियोजनाओं का एक और अहम पहलू यह है कि इनसे तिरुपति, कोलार गोल्ड फील्ड्स, मेट्तूर डैम, कोडाइकनाल हिल्स और सत्यमंगलम वन्यजीव अभयारण्य जैसे लोकप्रिय पर्यटन व तीर्थ स्थलों तक रेल संपर्क और बेहतर होगा, जिससे धार्मिक और पर्यटन यात्राएं आसान होंगी।
किन शहरों और मार्गों को होगा फायदा?
रेल मंत्रालय के अनुसार, इन सातों हाई-डेंसिटी कॉरिडोर के दायरे में देश के अनेक बड़े और महत्वपूर्ण शहर आते हैं:
- दिल्ली–हावड़ा मार्ग पर कानपुर, प्रयागराज, पं. दीनदयाल उपाध्याय (मुगलसराय), पटना और आसनसोल जैसे प्रमुख स्टेशन आते हैं।
- दिल्ली–मुंबई मार्ग मथुरा, कोटा, रतलाम, वडोदरा और सूरत जैसे शहरों को जोड़ता है।
- दिल्ली–चेन्नई मार्ग आगरा, ग्वालियर, झांसी, भोपाल, नागपुर और विजयवाड़ा से होकर गुजरता है।
इन मार्गों पर तीसरी और चौथी लाइन बिछने से ट्रेनों की गति और समय-पालन (पंक्चुअलिटी) दोनों में सुधार होने की उम्मीद है। साथ ही मालगाड़ियों को अलग ट्रैक मिलने से यात्री ट्रेनों की देरी भी कम होगी, जो फिलहाल एक बड़ी समस्या मानी जाती है।
कितने गांवों और कितनी आबादी को मिलेगा फायदा?
सरकार के मुताबिक, अकेले पूर्वी-मध्य भारत की तीन परियोजनाओं से करीब 4,790 गांवों और लगभग 56 लाख (5.6 मिलियन) की आबादी को सीधा फायदा मिलेगा। वहीं दक्षिण भारत की परियोजनाओं से भी लाखों लोगों को बेहतर रेल संपर्क मिलेगा। यह आंकड़ा दर्शाता है कि यह फैसला सिर्फ बड़े शहरों के लिए ही नहीं, बल्कि रास्ते में पड़ने वाले हज़ारों छोटे कस्बों और गांवों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पीएम गति शक्ति योजना से जुड़ाव
इन सभी परियोजनाओं को पीएम गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान के तहत योजनाबद्ध किया गया है। यह योजना अलग-अलग मंत्रालयों और परिवहन माध्यमों — रेल, सड़क, बंदरगाह, हवाई अड्डे — के बीच बेहतर तालमेल बनाकर मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है। सरकार का मानना है कि रेलवे क्षमता बढ़ने से न सिर्फ यात्रियों को फायदा होगा, बल्कि उद्योगों को भी माल की तेज़ और सस्ती ढुलाई का लाभ मिलेगा, जिससे अंततः देश की समग्र लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आएगी। भारत में लॉजिस्टिक्स लागत सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में अब भी कई विकसित देशों की तुलना में अधिक मानी जाती रही है, और सरकार इसे घटाने को अपनी प्राथमिकताओं में गिनती रही है।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने क्या कहा?
कैबिनेट बैठक के बाद पत्रकारों को संबोधित करते हुए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि आज की बैठक में रेलवे से जुड़े कुछ बेहद अहम फैसले लिए गए हैं, जो पिछले 12 वर्षों से चल रहे रेलवे के संपूर्ण कायाकल्प और आधुनिकीकरण कार्य का हिस्सा हैं। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में रेलवे के बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है, और यह ताज़ा फैसला उसी दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है। CCEA द्वारा जारी आधिकारिक बयान में भी कहा गया है कि बढ़ी हुई लाइन क्षमता से भारतीय रेलवे की गतिशीलता, परिचालन दक्षता और सेवा विश्वसनीयता में उल्लेखनीय सुधार होगा।
प्रधानमंत्री मोदी का बयान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच X पर एक पोस्ट के ज़रिए इस फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि तीन मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं से जुड़ा कैबिनेट का यह फैसला, जिनकी लागत ₹10,500 करोड़ से अधिक है, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में रेल नेटवर्क बढ़ाएगा और संपर्क को बेहतर बनाएगा। उन्होंने आगे कहा कि इससे इन राज्यों में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी, जिसका सीधा फायदा स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा।
इससे पहले की परियोजनाएं और पृष्ठभूमि
यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने रेलवे मल्टी-ट्रैकिंग को लेकर बड़ा फैसला लिया हो। बीते कुछ वर्षों में CCEA ऐसी कई परियोजनाओं को मंजूरी दे चुकी है:
- अगस्त 2023 में CCEA ने रेल मंत्रालय की सात मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को करीब ₹32,500 करोड़ की लागत से मंजूरी दी थी, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र सहित 35 जिलों को कवर करती थीं।
- अगस्त 2025 में कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार और असम को फायदा पहुंचाने वाली तीन मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं और गुजरात के कच्छ क्षेत्र के लिए एक नई रेल लाइन को मंजूरी मिली थी, जिससे करीब 3,108 गांवों और 47.34 लाख आबादी को फायदा होने का अनुमान लगाया गया था।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि सरकार बीते कई वर्षों से चरणबद्ध ढंग से देश के अलग-अलग हिस्सों में रेलवे की क्षमता बढ़ाने पर काम कर रही है, और ताज़ा फैसला इसी सिलसिले की अगली कड़ी है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
रेलवे विशेषज्ञों के मुताबिक मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं के कई स्तर पर सकारात्मक असर पड़ते हैं:
- माल ढुलाई क्षमता में इज़ाफा: अतिरिक्त लाइनों की वजह से मालगाड़ियों को अलग ट्रैक मिलेगा, जिससे कोयला, सीमेंट, लोहा-इस्पात जैसे भारी माल की ढुलाई तेज़ और सुगम होगी।
- यात्री ट्रेनों की समयबद्धता: मालगाड़ी और यात्री ट्रेनों के बीच ट्रैक साझा करने की मजबूरी घटने से यात्री ट्रेनों की देरी में कमी आने की उम्मीद है।
- रोजगार सृजन: निर्माण कार्य के दौरान बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे, खासकर संबंधित जिलों में।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी: रेलवे को सड़क परिवहन से ज़्यादा ऊर्जा-दक्ष माना जाता है। रेल क्षमता बढ़ने से सड़क मार्ग पर निर्भरता घटेगी, जिससे कार्बन उत्सर्जन और तेल आयात पर निर्भरता, दोनों में कमी आने की संभावना है।
- क्षेत्रीय विकास: जिन 31 जिलों को इन परियोजनाओं से सीधा फायदा मिलेगा, वहां बेहतर रेल संपर्क से व्यापार, उद्योग और पर्यटन को नई गति मिल सकती है।
आगे की राह
अब जब कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है, अगला चरण होगा इन परियोजनाओं के लिए विस्तृत टेंडरिंग, भूमि अधिग्रहण जहां आवश्यक हो, और निर्माण कार्य की शुरुआत। सरकार ने सभी आठ परियोजनाओं को 2029-30 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया है, यानी अगले करीब साढ़े तीन से चार वर्षों में यह अतिरिक्त 1,196 किलोमीटर लाइन भारतीय रेलवे नेटवर्क का हिस्सा बन जाएगी। इन परियोजनाओं की प्रगति पर रेल मंत्रालय समय-समय पर अपडेट जारी करता रहेगा।
कुल मिलाकर, मोदी कैबिनेट का यह फैसला भारतीय रेलवे के बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। देश के सात सबसे व्यस्त रेल कॉरिडोर, जो कुल यातायात का लगभग 40 प्रतिशत वहन करते हैं, पर मल्टी-ट्रैकिंग से न सिर्फ भीड़भाड़ कम होगी, बल्कि माल और यात्री दोनों तरह की ढुलाई तेज़, सुरक्षित और अधिक भरोसेमंद बनेगी।
हालांकि विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में लागत और परियोजनाओं की संख्या को लेकर थोड़ा-बहुत अंतर देखने को मिलता है — जैसे कहीं ₹11,000 करोड़ तो कहीं ₹20,804 करोड़ का ज़िक्र है — इसकी वजह यह है कि अलग-अलग रिपोर्ट्स एक ही कैबिनेट बैठक में मंजूर हुई परियोजनाओं के अलग-अलग हिस्सों (जैसे केवल पूर्वी भारत की तीन परियोजनाएं, या सभी आठ परियोजनाओं का संयुक्त आंकड़ा) पर आधारित हैं। बहरहाल, स्पष्ट है कि यह फैसला भारतीय रेलवे के दीर्घकालिक आधुनिकीकरण अभियान की एक अहम कड़ी है, जिसका लाभ आने वाले वर्षों में करोड़ों यात्रियों और देश की अर्थव्यवस्था दोनों को मिलने की उम्मीद है।