सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार पर आपराधिक मुकदमा चलाने, 13 करोड़ वोटरों के नाम हटाने की SIT जांच और फॉर्म-6 बहाल करने की मांग की गई है। जानें पूरी कहानी।

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Cec gyanesh kumar
भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद उस समय खड़ा हो गया जब देश की सर्वोच्च अदालत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई। यह याचिका चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही “विशेष गहन पुनरीक्षण” यानी Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया से जुड़ी है, जिसके तहत देशभर में करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का दावा किया जा रहा है।
यह मामला अब सिर्फ प्रशासनिक या तकनीकी नहीं रह गया है, बल्कि इसने संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक अधिकारों और सत्ता के दुरुपयोग जैसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस लेख में हम इस पूरे विवाद को विस्तार से समझेंगे — याचिका में क्या मांगा गया है, आरोप क्या हैं, चुनाव आयोग का पक्ष क्या है, और इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि क्या रही है।
याचिका किसने दाखिल की और कब
यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की। अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार देता है, और यही वजह है कि इस याचिका को गंभीरता से लिया जा रहा है। याचिका हाल ही में दाखिल की गई है, ऐसे समय में जब देशभर में SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों का विरोध पहले से ही चरम पर था।
याचिका में मुख्य मांगें क्या हैं
इस याचिका में कई गंभीर मांगें की गई हैं, जिन्हें बिंदुवार समझना जरूरी है:
1. CEC के खिलाफ आपराधिक मुकदमा: याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया जाए कि वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act), 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज करे और अभियोजन प्रक्रिया शुरू करे। यह धारा मतदाता सूचियों की तैयारी, पुनरीक्षण या सुधार से जुड़े आधिकारिक कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए सजा का प्रावधान करती है।
2. SIT जांच की मांग: याचिका में यह भी मांग की गई है कि लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया जाए।
3. फैसलों को अवैध घोषित करना: याचिकाकर्ता ने यह भी अनुरोध किया है कि CEC ज्ञानेश कुमार द्वारा बिना अन्य दो चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — की सहमति के लिए गए सभी फैसले, दिशानिर्देश, निर्देश और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलाव असंवैधानिक, अधिकारातीत (ultra vires) और शुरुआत से ही शून्य (void ab initio) घोषित किए जाएं। याचिका में CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का हवाला दिया गया है, जो पूर्ण आयोग की सहमति या बहुमत की राय को अनिवार्य बनाती है।
4. फॉर्म-6 की बहाली: याचिका में यह भी मांग की गई है कि ECINet और ERONet पोर्टल पर फॉर्म-6 में जो बदलाव किए गए, उन्हें रद्द किया जाए और 1960 के नियमों के तहत निर्धारित मूल सांविधिक फॉर्म को बहाल किया जाए। फॉर्म-6 वह प्रपत्र है जिसका इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है।
5. अन्य अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग: याचिका में केवल CEC ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और चुनाव आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी (IT) महानिदेशक सीमा खन्ना के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई है।
विवाद की जड़ — 14 बार दर्ज की गई आपत्तियां
इस याचिका की पृष्ठभूमि में एक रिपोर्ट है, जो हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस अखबार में प्रकाशित हुई थी। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच, यानी करीब 10 महीने की अवधि में, दो चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से लिखित आपत्तियां और असहमति दर्ज कराई।
कथित तौर पर एक ही दिन में चार बार तक ऐसी आपत्तियां दर्ज की गईं। रिपोर्ट के अनुसार यह असहमति मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, पंजीकरण प्रक्रिया में बदलाव और मतदाता सूची से जुड़े डेटा के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों को लेकर थी। इन खुलासों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में फैसले सामूहिक रूप से लिए जा रहे हैं, या फिर CEC अकेले ही महत्वपूर्ण निर्णय ले रहे हैं।
13 करोड़ वोटरों के नाम हटाए जाने का दावा
इस पूरे विवाद के केंद्र में एक आंकड़ा है — करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का दावा। कांग्रेस पार्टी की ओर से इस आंकड़े को बार-बार उठाया गया है। कांग्रेस महासचिव और कर्नाटक प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि जून 2025 से अब तक चुनाव आयोग ने 19 राज्यों में SIR प्रक्रिया चलाई है, जिसमें करीब 13 करोड़ नाम हटाए गए हैं
इनमें अकेले कर्नाटक में 1.43 करोड़ नाम शामिल हैं। सुरजेवाला ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को “हाईजैक” कर लिया गया है और मतदाता सूची पर कब्जा कर लिया गया है, जिसमें CEC की सीधी संलिप्तता है। उन्होंने SIR प्रक्रिया को तत्काल रोकने, CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने और मतदाता डेटाबेस की स्वतंत्र जांच की मांग की।
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी वायनाड में मीडिया से बातचीत के दौरान इस मुद्दे पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाना लोकतंत्र, संविधान और देश के खिलाफ एक आपराधिक कृत्य है। उन्होंने मांग की कि अगर CEC द्वारा अवैध कृत्य किए जाने की पुष्टि होती है, तो उन्हें भी किसी आम अपराधी की तरह मुकदमे का सामना करना चाहिए और उन्हें कानूनी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। प्रियंका गांधी ने यह भी कहा कि उनके भाई और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कई प्रेस कॉन्फ्रेंस में इससे जुड़े सबूत पेश किए हैं, और भाजपा की प्रतिक्रिया को उन्होंने “कमजोर और घिसा-पिटा बहाना” करार दिया।
चुनाव आयोग का पक्ष
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन तमाम आरोपों को खारिज किया है। आयोग ने इस बात से इनकार किया है कि SIR से जुड़े फैसले पूर्ण आयोग की मंजूरी के बिना लिए गए। ECI अधिकारियों का कहना है कि SIR से जुड़े आदेश, जिनमें फॉर्म-6 से संबंधित आदेश भी शामिल हैं, नियमानुसार और पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए जारी किए गए।
आयोग ने आंतरिक मतभेद की बात को भी खारिज करते हुए कहा है कि चुनाव आयुक्तों के बीच हुई चर्चाओं को “संस्थागत असहमति” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, और SIR से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। पश्चिम बंगाल के मामले में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि वहां 38.31 लाख अपीलें दाखिल की गईं, जिनमें से 22.21 लाख नाम शामिल करने और 16.10 लाख नाम हटाने से जुड़ी थीं।
SIR प्रक्रिया आखिर है क्या
इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया दरअसल है क्या। यह चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर चलाई जाने वाली एक कवायद है, जिसका मकसद मतदाता सूचियों को अद्यतन और शुद्ध करना होता है — यानी मृत व्यक्तियों, स्थान बदल चुके लोगों और दोहरी प्रविष्टियों को सूची से हटाना, और नए योग्य मतदाताओं को जोड़ना।
ज्यादातर राज्यों में इससे पहले की गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया 2002 से 2004 के बीच हुई थी, जबकि उत्तराखंड में आखिरी बार यह प्रक्रिया 2006 में हुई थी। इस लिहाज से मौजूदा SIR प्रक्रिया को दशकों बाद हो रही एक बड़ी कवायद माना जा रहा है, और यही वजह है कि इसका दायरा और असर इतना व्यापक है।
बिहार से शुरू हुआ विवाद
मौजूदा विवाद की जड़ें बिहार में हुई SIR प्रक्रिया में भी देखी जा सकती हैं, जहां यह कवायद पहली बार बड़े पैमाने पर विवादों में घिरी थी। बिहार में यह प्रक्रिया 30 सितंबर को पूरी हुई थी, जिसके बाद आयोग ने 68 लाख नाम हटाकर और 5 लाख नए नाम जोड़कर 7.42 करोड़ मतदाताओं की सूची जारी की। इसमें से 65 लाख नाम शुरुआती ड्राफ्ट सूची में हटाए गए थे, जबकि बाद की जांच के दौर में 3.6 लाख और नाम हटाए गए।
बिहार में इस प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने आरोप लगाया था कि यह गरीब, प्रवासी और दलित मतदाताओं को बाहर करने के मकसद से चलाई जा रही है, और नाम जोड़ने-हटाने के जरिए चुनाव आयोग सत्तारूढ़ भाजपा के साथ मिलकर “वोट चोरी” कर रहा है। इस विवाद ने वामपंथी दलों, DMK और तृणमूल कांग्रेस जैसे उन दलों को भी आंदोलित किया,
जिनकी सरकारें क्रमशः केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हैं — इन राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता की वजह से ही आयोग को 65 लाख हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक करनी पड़ी थी, हालांकि शुरुआत में आयोग की ओर से इसमें टालमटोल की गई थी।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर पहले भी विवाद
यह पहला मौका नहीं है जब CEC और चुनाव आयुक्तों की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे हों। इससे पहले CEC और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की वैधता को भी चुनौती दी गई थी। यह कानून दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया था, जिसके तहत CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर कर दिया गया।
इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की मांग करते हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से अदालत में दलील दी थी कि केंद्र सरकार अनूप बरनवाल मामले में आए संविधान पीठ के फैसले का “मजाक” बना रही है। ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति भी इसी 2023 के कानून के तहत हुई थी, जिसे लेकर पहले से ही राजनीतिक तौर पर सवाल उठते रहे हैं।
संस्थागत सवाल — क्यों है यह मामला अहम
यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक याचिका या एक आंकड़े का विवाद नहीं है, बल्कि इसमें कई गहरे संस्थागत सवाल छिपे हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि क्या भारत का चुनाव आयोग, जो संविधान के तहत एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में काम करने के लिए बना है, वास्तव में सामूहिक रूप से निर्णय ले रहा है, या फिर एक व्यक्ति यानी CEC के हाथों में शक्तियों का केंद्रीकरण हो गया है।
दूसरा सवाल यह है कि मतदाता सूची जैसे संवेदनशील मामले में, जहां करोड़ों नागरिकों के मताधिकार का सवाल जुड़ा है, पारदर्शिता और जवाबदेही का स्तर कैसा होना चाहिए। तीसरा और सबसे अहम सवाल यह है कि क्या स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं पर सरकार के प्रभाव को लेकर उठ रहे सवाल जायज हैं, या यह केवल राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है।
विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर की जा रही यह छंटाई लोकतंत्र की बुनियाद पर ही हमला है, क्योंकि इससे खासकर हाशिए पर खड़े, प्रवासी और युवा मतदाताओं के लिए मतदान करना कठिन हो सकता है। कांग्रेस नेता सुरजेवाला ने यह भी कहा कि ऐसे बदलाव जेन-Z यानी नई पीढ़ी के मतदाताओं के लिए पंजीकरण में रुकावटें पैदा कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ भाजपा का पक्ष यह है कि मतदाता सूचियों की सफाई एक जरूरी और नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका मकसद फर्जी और अपात्र मतदाताओं को हटाना है, ताकि चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता बनी रहे।
आगे क्या हो सकता है
फिलहाल यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जा चुकी है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अभी इस पर सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है — क्या वह चुनाव आयोग से जवाब तलब करेगी, क्या SIT जांच का आदेश दिया जाएगा, या फिर याचिका को सुनवाई योग्य ही नहीं माना जाएगा। इसके अलावा, यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या चुनाव आयोग इस याचिका के जवाब में अपने आंतरिक कामकाज को लेकर कोई औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करता है।
जिस तरह बिहार SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आयोग को हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक करनी पड़ी थी, उसी तरह इस याचिका के जरिए भी यह उम्मीद जताई जा रही है कि अदालत पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाएगी।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल यह याचिका भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में एक बेहद संवेदनशील मुद्दे को उठाती है — क्या चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था अपने बहु-सदस्यीय ढांचे के अनुरूप काम कर रही है, और क्या मतदाता सूचियों की शुद्धि के नाम पर की जा रही प्रक्रिया वाकई निष्पक्ष और पारदर्शी है। एक तरफ याचिकाकर्ता और विपक्षी दल गंभीर आरोप लगा रहे हैं, जिनमें आपराधिक मुकदमे और SIT जांच तक की मांग शामिल है, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपनी प्रक्रिया को नियमानुसार बता रहा है।
यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, खासकर उन राज्यों में जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। अंततः, इस पूरे विवाद का फैसला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसमें सामने आने वाले तथ्यों पर निर्भर करेगा, लेकिन तब तक यह मुद्दा भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख से जुड़ी बहस के केंद्र में बना रहेगा।
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