Breaking Tamil Nadu government’s U-turn 2026: भारी विरोध के बाद विजय सरकार ने कानून व्यवस्था विभाग को RTI से छूट देने का आदेश वापस लिया

तमिलनाडु(Tamil Nadu) की विजय सरकार ने कानून-व्यवस्था विभाग को RTI एक्ट से छूट देने वाला विवादित आदेश विपक्ष और सहयोगी दलों के भारी विरोध के बाद वापस लिया। जानें पूरा मामला।

Tamil Nadu government’s U-turn

तमिलनाडु की राजनीति में इस हफ्ते एक ऐसा मामला सुर्खियों में रहा, जिसने पारदर्शिता, सूचना के अधिकार और सरकार की जवाबदेही जैसे बड़े मुद्दों को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया। अभिनेता से नेता बने चिन्नी जयकांतन उर्फ जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) सरकार ने कानून-व्यवस्था (Law and Order) विभाग को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के दायरे से बाहर करने का आदेश जारी किया था। लेकिन विपक्षी दलों, सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगियों और मीडिया की तीखी आलोचना के बाद रविवार को सरकार को यह आदेश वापस लेना पड़ा। यह पूरा घटनाक्रम न सिर्फ तमिलनाडु बल्कि पूरे देश में पारदर्शिता बनाम गोपनीयता की बहस को नए सिरे से जन्म देता है।

मामला क्या था?

21 सितंबर 2026 को तमिलनाडु सरकार के मानव संसाधन प्रबंधन (Human Resources Management) विभाग ने एक राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification) जारी की थी। इस अधिसूचना के जरिए सरकार ने पब्लिक (लॉ एंड ऑर्डर) डिपार्टमेंट यानी कानून-व्यवस्था से जुड़े सार्वजनिक विभाग को RTI Act की धारा 24 की उपधारा (4) के तहत “इंटेलिजेंस एंड सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन” यानी खुफिया एवं सुरक्षा संगठन घोषित कर दिया था। इस आदेश को औपचारिक रूप से “गवर्नमेंट ऑर्डर एमएस नंबर 57” के नाम से जाना गया।

RTI Act की धारा 24 के तहत कुछ खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को कानून के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न हो। लेकिन कानून-व्यवस्था विभाग जैसे नियमित प्रशासनिक विभाग को इस श्रेणी में डालना कई लोगों को असामान्य और आपत्तिजनक लगा, क्योंकि यह विभाग सीधे आम जनता के जीवन, सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े मामलों को संभालता है — जिसमें पुलिस हिरासत में हुई मौतें, हिरासत में यातना (custodial torture), और रिमांड पर मौजूद कैदियों की मृत्यु जैसे अत्यंत संवेदनशील और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

इस विभाग के अंतर्गत करीब 20 अलग-अलग सेक्शन आते हैं, जिनमें से सामान्यतः केवल कुछ चुनिंदा हिस्सों को ही RTI से छूट मिली होती है — जैसे कि वे मामले जो सीधे तौर पर खुफिया अभियानों या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हों। लेकिन नए आदेश में पूरे विभाग को ही एकमुश्त तौर पर RTI के दायरे से बाहर कर दिया गया था, जिसे आलोचकों ने “ब्लैंकेट एग्जेम्पशन” (blanket exemption) यानी अंधाधुंध छूट करार दिया।

विपक्ष और सहयोगी दलों का तीखा विरोध

जैसे ही यह अधिसूचना सार्वजनिक हुई, राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। विपक्षी दलों ने इसे सरकार की नाकामी छिपाने की कोशिश बताया। आलोचकों का कहना था कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पहले से ही सवालों के घेरे में है — राज्य में 500 से अधिक हत्याओं के मामले सामने आ चुके हैं, और ऐसे समय में जब सरकार को जवाबदेह होना चाहिए, वह उल्टे पारदर्शिता के दरवाजे बंद करने में जुटी है।

एक वरिष्ठ नेता ने कड़े शब्दों में कहा कि जब सरकार कानून-व्यवस्था को संभालने में असमर्थ साबित हो रही है, तो अपनी नाकामी को छिपाने के लिए वह शर्मनाक तरीके से RTI के अधिकार को सीमित करने की कोशिश कर रही है, ताकि जनता कानून-व्यवस्था से जुड़ी जानकारी तक भी न मांग सके।

विरोध केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहा। सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल विदुथलाई चिरुथैगल कच्ची (VCK) के प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने भी इस अधिसूचना पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे “अत्यंत चौंकाने वाला” (highly shocking) कदम बताते हुए चेतावनी दी कि यह आदेश मानवाधिकारों के दमन का रास्ता खोल सकता है (pave the way for suppressing human rights)। उन्होंने सरकार से इस आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की।

एक अन्य नेता वेंकटेसन ने भी इस मुद्दे पर बयान देते हुए कहा कि RTI Act पहले से ही कानून-व्यवस्था से जुड़े कुछ चुनिंदा सार्वजनिक क्षेत्र के मामलों में छूट का प्रावधान देता है, लेकिन पूरे विभाग को इस तरह छूट देना पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि इस तरह कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों को RTI के दायरे से बाहर करना कड़ी निंदा के योग्य है, और सरकार को यह आदेश तुरंत वापस लेना चाहिए।

मीडिया में भी इस मुद्दे को लेकर तीखी टिप्पणियां आईं। कुछ रिपोर्ट्स में इस कदम को “तमिलनाडु को पुलिस स्टेट में बदलने की खुली कोशिश” तक करार दिया गया, जो दर्शाता है कि इस अधिसूचना ने कितनी गहरी नाराजगी पैदा की।

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सरकार का यू-टर्न: आदेश वापस लिया गया

बढ़ते राजनीतिक दबाव और लगातार आलोचना के बीच, रविवार को तमिलनाडु सरकार ने अंततः यह विवादित आदेश वापस लेने का फैसला किया। मानव संसाधन प्रबंधन विभाग की ओर से जारी नई अधिसूचना में स्पष्ट रूप से कहा गया कि 21 सितंबर 2026 को जारी गवर्नमेंट ऑर्डर एमएस नंबर 57, जो कानून-व्यवस्था विभाग को RTI Act की धारा 24(4) के तहत छूट देता था, अब रद्द (revoked) माना जाएगा।

यह सरकार के लिए एक स्पष्ट यू-टर्न था, जो दिखाता है कि गठबंधन सहयोगियों और जनता के दबाव के आगे सरकार को झुकना पड़ा। हालांकि सरकार की ओर से इस वापसी के पीछे कोई विस्तृत स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से नहीं दिया गया, लेकिन यह साफ है कि लगातार बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव ने इस फैसले में अहम भूमिका निभाई।

यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत के सबसे शक्तिशाली पारदर्शिता कानूनों में से एक माना जाता है। इस कानून ने आम नागरिकों को यह अधिकार दिया कि वे सरकारी विभागों से जानकारी मांग सकें, प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठा सकें, और भ्रष्टाचार व अनियमितताओं को उजागर कर सकें। यही कारण है कि जब भी किसी सरकार द्वारा RTI के दायरे को सीमित करने की कोशिश की जाती है, तो यह तुरंत बड़ी बहस का विषय बन जाता है।

कानून-व्यवस्था विभाग जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पारदर्शिता विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह सीधे नागरिकों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और मानवाधिकारों से जुड़ा होता है। हिरासत में मौत, पुलिस उत्पीड़न, और रिमांड के दौरान होने वाली मौतों जैसे मामलों में पारदर्शिता की कमी न केवल न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि पीड़ित परिवारों को न्याय पाने से भी वंचित कर सकती है।

अगर यह छूट लागू रहती, तो आम नागरिकों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए इन संवेदनशील मामलों में जानकारी हासिल करना लगभग असंभव हो जाता। यही वजह है कि इस आदेश को कई विश्लेषकों ने “लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सीधा हमला” करार दिया।

ऐतिहासिक संदर्भ: RTI में छूट को लेकर पहले भी विवाद

यह पहला मौका नहीं है जब भारत में किसी सरकार ने RTI Act के दायरे को सीमित करने की कोशिश की हो और बाद में विरोध के चलते पीछे हटना पड़ा हो। इससे पहले केंद्र सरकार के स्तर पर भी RTI Act में संशोधन को लेकर प्रस्ताव आए थे, जिनका सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों ने कड़ा विरोध किया था। उस समय भी सरकार को जनदबाव के आगे झुकते हुए प्रस्तावित संशोधनों को वापस लेना पड़ा था।

इसी तरह, अलग-अलग राज्यों में भी प्रशासनिक आदेशों को लेकर विवाद और उनकी वापसी की घटनाएं सामने आती रही हैं, जब जनता या कर्मचारियों के विरोध के बाद सरकारों को अपने फैसले बदलने पड़े। यह दिखाता है कि भारत में नागरिक समाज, मीडिया और विपक्षी दल पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर कितने सजग हैं, और सरकारों को जवाबदेह बनाए रखने में इनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

TVK सरकार के लिए इसके क्या मायने हैं?

जोसेफ विजय की अगुवाई वाली TVK सरकार तमिलनाडु में अपेक्षाकृत नई है, और यह घटनाक्रम उसके लिए एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा साबित हुआ। एक ओर जहां सरकार को शासन-प्रशासन से जुड़े कई फैसले लेने होते हैं, वहीं दूसरी ओर उसे गठबंधन सहयोगियों और जनता के भरोसे को भी बनाए रखना होता है।

इस मामले में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि विरोध केवल विपक्षी दलों तक सीमित नहीं था — बल्कि खुद सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी दल VCK ने भी इस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई। यह दर्शाता है कि गठबंधन की राजनीति में हर फैसले को लेकर आम सहमति बनाना कितना जरूरी होता है, और अगर सहयोगी दल भी असहमति जताएं, तो सरकार के लिए फैसले पर टिके रहना मुश्किल हो जाता है।

इस पूरे प्रकरण ने यह भी दिखाया कि नई सरकारें प्रशासनिक फैसले लेते समय कितनी सतर्कता बरतें, क्योंकि पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर जनता और मीडिया की नजर हमेशा बनी रहती है। एक गलत कदम राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है, जैसा कि इस मामले में हुआ।

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आगे क्या?

फिलहाल सरकार ने विवादित आदेश वापस ले लिया है, लेकिन इस पूरे मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या भविष्य में सरकार कानून-व्यवस्था विभाग के कुछ विशिष्ट और वाकई संवेदनशील हिस्सों को सीमित तरीके से RTI से छूट देने की कोशिश करेगी? क्या इस घटनाक्रम के बाद पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर सरकार अधिक सतर्क रुख अपनाएगी? और क्या विपक्ष तथा नागरिक समाज इस मुद्दे को आगे भी जीवित रखेंगे, ताकि भविष्य में ऐसी कोई कोशिश दोबारा न हो?

यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस घटनाक्रम का असर आने वाले समय में तमिलनाडु की राजनीति और गठबंधन की गतिशीलता पर पड़ता है। जिस तरह से सहयोगी दल ने खुलकर विरोध जताया, उससे यह संकेत मिलता है कि गठबंधन के भीतर सरकार के कुछ फैसलों को लेकर मतभेद मौजूद हैं, जो आने वाले समय में और सतह पर आ सकते हैं।

तमिलनाडु सरकार द्वारा कानून-व्यवस्था विभाग को RTI Act से छूट देने और फिर भारी विरोध के बाद उसे वापस लेने की यह पूरी घटना भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनदबाव की ताकत को दर्शाती है। यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे नागरिक समाज, विपक्ष और यहां तक कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर के सहयोगी दल भी मिलकर किसी सरकार को उसके फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

RTI Act भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की एक अहम कड़ी है, और इस तरह की घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि पारदर्शिता से जुड़े किसी भी कानून में बदलाव करते समय अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तमिलनाडु सरकार इस अनुभव से क्या सीखती है, और क्या वह भविष्य में प्रशासनिक पारदर्शिता को बनाए रखने के प्रति अधिक प्रतिबद्ध नजर आती है।


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