Assam flood news Hindi में अब तक 50 से ज्यादा मौतें, 10 लाख+ लोग प्रभावित। जानें बाढ़ के कारण, सबसे ज्यादा प्रभावित जिले, NDRF-SDRF का राहत अभियान और सरकार की मदद की पूरी जानकारी।

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असम बाढ़ 2026: तबाही, संघर्ष और उम्मीद की पूरी कहानी
भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में हर साल मानसून के मौसम में बाढ़ आना एक जानी-पहचानी त्रासदी बन चुकी है, लेकिन 2026 की बाढ़ ने पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों के उफान ने राज्य के दर्जनों जिलों को अपनी चपेट में ले लिया है। गांव के गांव पानी में डूब गए हैं, हजारों घर तबाह हो गए हैं, खेतों की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, और लाखों लोग बेघर होकर राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हैं।
बाढ़ की शुरुआत कैसे हुई
2026 की यह आपदा जून के अंत में शुरू हुई थी, जब असम के धेमाजी, डिब्रूगढ़, लखीमपुर, चिरांग और नलबाड़ी जैसे जिलों में लगातार भारी बारिश शुरू हुई। शुरुआती दौर में करीब 45,000 लोग प्रभावित हुए थे, जिनमें से अकेले धेमाजी जिले में 41,000 से ज्यादा लोग शामिल थे। उस समय 96 से ज्यादा गांव जलमग्न हो गए थे और धेमाजी के जोनाई उपमंडल में एक व्यक्ति तेज बहाव में बह गया था।
पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश में भी फ्लैश फ्लड और भूस्खलन से तीन लोगों की मौत हुई थी, जिसके बाद भारतीय वायुसेना को पहाड़ी रास्तों पर फंसे लोगों को बचाने के लिए बुलाना पड़ा।
लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। जुलाई महीने में लगातार बारिश और अपस्ट्रीम से आने वाले भारी जल प्रवाह ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। ब्रह्मपुत्र, बराक और उनकी कई सहायक नदियां खतरे के निशान से ऊपर बहने लगीं, और तटबंध टूटने से पानी बड़े इलाकों में फैल गया।
ताजा हालात: मौत का आंकड़ा और प्रभावित लोग
Assam me badh ke halat जुलाई के अंत तक असम में स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार, बाढ़ से मरने वालों की संख्या 50 तक पहुंच गई है, जबकि असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या 47 है, और करीब 8 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं—इनमें से 6 लोग शिवसागर से, और एक-एक धेमाजी और चराइदेव से हैं।
ASDMA के अनुसार, असम के 25 जिलों में 10 लाख 63 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। कुल 77 राजस्व सर्किल और 2023 गांव बाढ़ की चपेट में हैं। सबसे ज्यादा नुकसान शिवसागर जिले में हुआ है, जहां अकेले 21 लोगों की मौत दर्ज की गई है—यह जिला इस आपदा का सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाका बनकर उभरा है।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 7.2 लाख से ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं और सबसे ज्यादा नुकसान झेलने वाले जिलों में शिवसागर, चराइदेव, गोलाघाट, डिब्रूगढ़, धेमाजी, लखीमपुर, माजुली, जोरहाट, तिनसुकिया, दरांग और सोनितपुर शामिल हैं। इन इलाकों में हजारों परिवार अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की तलाश में भटक रहे हैं।
बाद के एक अपडेट के अनुसार राहत की खबर यह है कि पानी उतरने लगा है और स्थिति में कुछ सुधार देखा जा रहा है। शिवसागर, गोलाघाट, जोरहाट और चराइदेव जैसे बुरी तरह प्रभावित जिलों में अब 109 राहत शिविरों में 37,000 से ज्यादा लोग शरण लिए हुए हैं। अकेले शिवसागर जिले में 66 राहत शिविर हैं जिनमें 30,000 से अधिक लोग रह रहे हैं।

बाढ़ के मुख्य कारण
असम में हर साल आने वाली इस बाढ़ के पीछे कई वजहें हैं:
भारी मानसूनी बारिश – पिछले कुछ हफ्तों से असम और आसपास के पूर्वोत्तर राज्यों में लगातार और असामान्य रूप से तेज बारिश हो रही है, जिससे नदियों में जलस्तर तेजी से बढ़ा है।
ब्रह्मपुत्र और सहायक नदियों का उफान – ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियां जैसे बराक, बूढ़ी दिहिंग, कोपिली, सोनाई, कटाखल और कुशियारा खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं, जिससे इनका पानी आसपास के इलाकों में फैल गया है।
तटबंधों का टूटना – कई जगहों पर नदियों के किनारे बने तटबंध पानी के भारी दबाव को सहन नहीं कर पाए और टूट गए, जिससे गांव के गांव जलमग्न हो गए।
नदी के कटाव और अपस्ट्रीम से पानी का बहाव – पड़ोसी राज्यों और नदी के ऊपरी हिस्सों से आने वाला भारी जल प्रवाह भी असम की बाढ़ को और गंभीर बनाता है।
भौगोलिक बनावट – असम की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि ब्रह्मपुत्र घाटी में बसा यह राज्य हर मानसून में बाढ़ के प्रति स्वाभाविक रूप से संवेदनशील रहता है।
बचाव और राहत कार्य
इस विशाल आपदा से निपटने के लिए राज्य और केंद्र सरकार, दोनों ने मिलकर काम किया है।
- राहत और बचाव कार्यों में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और भारतीय सेना की टीमें लगातार जुटी हुई हैं।
- बचावकर्मी inflatable rafts और भारी मशीनरी के जरिए उन इलाकों में फंसे लोगों को निकाल रहे हैं जहां सड़क संपर्क पूरी तरह टूट चुका है।
- अब तक कुल 1,072 राहत शिविर बनाए जा चुके हैं, जिनमें 41,264 लोगों को शरण दी गई है।
- राहत कार्यों में 111 मेडिकल टीमें, 56 बचाव नौकाएं और 1 हेलिकॉप्टर तैनात किए गए हैं।
- मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि सरकार महामारी या किसी भी बीमारी के प्रकोप को रोकने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है, और इस पूरे अभियान को उन्होंने “युद्धस्तर” पर चलाए जाने की बात कही है।
- केंद्र सरकार ने भी पूरा सहयोग देने का भरोसा दिलाया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम को हर संभव मदद का आश्वासन दिया, और एक अंतर-मंत्रालयी टीम को नुकसान का जायजा लेने के लिए 25 जुलाई को असम भेजा गया।
- राज्य सरकार ने बाढ़ में जान गंवाने वाले परिवारों को 4 लाख रुपये प्रति व्यक्ति मुआवजे के तौर पर देने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस नुकसान की भरपाई किसी भी तरह से नहीं हो सकती, लेकिन सरकार पीड़ित परिवारों को कुछ सहारा देने की कोशिश कर रही है।
गैर-सरकारी संगठनों की भी इस आपदा में अहम भूमिका रही है। भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी की असम शाखा दशकों से राज्य की वार्षिक बाढ़ आपदाओं में सबसे आगे रहकर काम करती आई है, और इस बार भी वह खाना, साफ पानी, कपड़े और जरूरी सामान बांटने में जुटी है, खासकर बच्चों और कमजोर वर्गों पर ध्यान देते हुए। इसके अलावा CARE और Save the Children जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी राहत शिविरों, स्वच्छता व्यवस्था और बाल सुरक्षा सेवाओं में मदद कर रही हैं, जबकि Oxfam India, Goonj और Rapid Response जैसे स्थानीय NGO भी समानांतर रूप से राहत अभियान चला रहे हैं।
फसलों और अवसंरचना को नुकसान
बाढ़ ने सिर्फ इंसानी जिंदगियों को ही नहीं, बल्कि खेती और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। ASDMA के मुताबिक करीब 24,897 हेक्टेयर खेती की जमीन पानी में डूब चुकी है, जिससे मानसून की खेती के मौसम में हजारों किसान प्रभावित हुए हैं। सड़कें, पुल, रेल पटरियां और अन्य बुनियादी ढांचे भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिससे कई इलाकों का संपर्क मुख्य शहरों से टूट गया है। लोक निर्माण विभाग (PWD) को क्षतिग्रस्त सड़कों और अन्य अहम ढांचों की मरम्मत में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं।
असम की बाढ़ का इतिहास: एक बार-बार लौटने वाली आपदा
असम में बाढ़ कोई नई बात नहीं है—यह राज्य हर साल मानसून के दौरान किसी न किसी स्तर की बाढ़ का सामना करता है। कुछ उदाहरण देखें तो समझ आता है कि यह समस्या कितनी गहरी और पुरानी है:
- 2020 की बाढ़: कोविड-19 महामारी के दौरान आई इस बाढ़ ने असम के 33 में से 30 जिलों को प्रभावित किया था, जिसमें 149 लोगों की जान गई और 50 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे।
- 2022 की सिलचर बाढ़: बराक नदी के तटबंध टूटने से आई इस बाढ़ में 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और सिलचर शहर 11 दिनों तक पानी में डूबा रहा था, जहां कुछ जगहों पर पानी का स्तर 12 फीट तक पहुंच गया था।
- 2024 की बाढ़: इस साल जून में आई बाढ़ ने असम में 109 लोगों की जान ली थी, और यह आपदा बाद में गुजरात सहित कई अन्य राज्यों में भी फैली थी।
- 2025 की बाढ़: जून 2025 में भी असम में गंभीर बाढ़ आई थी, जिसमें शुरुआती दिनों में ही 6 लाख से ज्यादा लोग 21 जिलों में प्रभावित हुए थे और मृतकों की संख्या 12 तक पहुंच गई थी।
इन आंकड़ों से साफ है कि असम हर साल मानसून के मौसम में एक जैसी त्रासदी से गुजरता है, और हर बार जान-माल का भारी नुकसान होता है।
चुनौतियां जो अब भी बनी हुई हैं
बाढ़ के बीच सबसे बड़ी चुनौती दूर-दराज के इलाकों तक मदद पहुंचाना है। मुख्यमंत्री सरमा ने खुद स्वीकार किया कि सरकारी टीमें नाजिरा में करीब 50,000 और शिवसागर में 30,000 लोगों तक अब तक नहीं पहुंच पाई हैं। सड़क संपर्क टूटने और पानी के तेज बहाव के कारण बचाव अभियान बेहद मुश्किल हो गया है।
इसके अलावा बाढ़ के बाद बीमारियों के फैलने का खतरा भी बना रहता है—दूषित पानी, सांप के काटने की घटनाएं, डायरिया और अन्य जलजनित बीमारियां आमतौर पर बाढ़ के बाद असम में आम समस्या बन जाती हैं। यही वजह है कि सरकार महामारी रोकने पर खास जोर दे रही है।
दीर्घकालिक समाधान की जरूरत
असम में हर साल आने वाली इस विनाशकारी बाढ़ को देखते हुए विशेषज्ञ लंबे समय से स्थायी समाधान की मांग करते आए हैं। इनमें शामिल हैं:
- मजबूत तटबंध – मौजूदा तटबंधों को और मजबूत बनाना ताकि वे भारी जलस्तर का दबाव झेल सकें।
- बेहतर जल निकासी व्यवस्था – शहरी और ग्रामीण इलाकों में जल निकासी की बेहतर व्यवस्था करना।
- उन्नत बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली – समय रहते बाढ़ की चेतावनी देने वाली आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल।
- नदी प्रबंधन परियोजनाएं – ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक योजनाएं।
- जलवायु-अनुकूल अवसंरचना – ऐसी इमारतें और ढांचे बनाना जो बाढ़ जैसी आपदाओं का सामना कर सकें।
इन उपायों पर अगर गंभीरता से काम किया जाए, तो असम की सालाना बाढ़ त्रासदी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
असम की 2026 की बाढ़ एक बार फिर याद दिलाती है कि यह राज्य कितनी बार प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होता है। 50 से ज्यादा लोगों की जान जाने और 10 लाख से अधिक लोगों के प्रभावित होने के बावजूद, राहत और बचाव टीमों ने दिन-रात मेहनत करके लाखों लोगों की जान बचाई है। हालांकि राहत की खबर यह है कि कई जिलों में अब पानी उतरना शुरू हो गया है,
लेकिन असली चुनौती अब भी बाकी है—पुनर्वास, बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण और प्रभावित परिवारों की आजीविका को दोबारा खड़ा करना। जब तक स्थायी और दीर्घकालिक समाधान नहीं अपनाए जाते, असम को हर साल इसी तरह की बाढ़ त्रासदी का सामना करना पड़ता रहेगा। यह वक्त है कि सरकार, समाज और वैज्ञानिक समुदाय मिलकर इस पुरानी समस्या का स्थायी हल खोजें, ताकि आने वाली पीढ़ियां हर मानसून में इस डर के साये में न जिएं।
नोट: यह लेख जुलाई 2026 तक उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। स्थिति तेजी से बदल रही है, इसलिए ताजा और आधिकारिक अपडेट के लिए असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) की वेबसाइट देखें।
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