Breaking news 2026: SCO में पानी के लिए गिड़गिड़ाए PAK PM शहबाज़, BJP का करारा जवाब- ‘याद है ना?’

SCO समिट में शहबाज़ शरीफ ने सिंधु जल संधि का हवाला देकर भारत पर निशाना साधा, बीजेपी ने ऑपरेशन सिंदूर की याद दिलाकर दिया मुंहतोड़ जवाब। पढ़ें पूरी कहानी।

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत को परोक्ष रूप से निशाना बनाते नज़र आए, लेकिन इस बार मुद्दा सीमा पार आतंकवाद या कश्मीर नहीं, बल्कि पानी था। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में शहबाज़ ने पानी को क्षेत्र का “जीवन रक्त” (lifeblood) बताते हुए यह अपील की कि इसे कभी भी राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। बिना भारत का सीधा नाम लिए, उनका इशारा साफ तौर पर सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) और भारत द्वारा उसे स्थगित किए जाने की तरफ था।

लेकिन जैसे ही यह बयान सामने आया, भारत में सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। सबसे चर्चित प्रतिक्रिया आई भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल से, जिसने एक मीम-शैली की वीडियो रील शेयर करते हुए तंज कसा और पूछा — “पानी… पानी… पानी? भारतीय सेना ने पिलाया था पानी, याद है ना?” यह जवाब सीधे तौर पर मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर और उससे जुड़ी घटनाओं की तरफ इशारा करता है।

इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए हमें कुछ कदम पीछे जाकर पूरी पृष्ठभूमि को समझना होगा — SCO समिट का संदर्भ, सिंधु जल संधि का इतिहास, पहलगाम हमला, ऑपरेशन सिंदूर, हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत का हालिया फैसला, और अब इस पूरे विवाद पर भारत की राजनीतिक प्रतिक्रिया।

SCO समिट और शहबाज़ का बयान

सिंधु जल समझौता,यह घटनाक्रम किर्गिज़स्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के 26वें शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आया। इस समिट में SCO के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने हिस्सा लिया, और पाकिस्तान इस साल SCO की Council of Heads of State की अध्यक्षता 2026-27 के लिए संभाल रहा है।

अपने संबोधन में शहबाज़ शरीफ ने कहा कि पानी लाखों-करोड़ों लोगों की ज़िंदगी को सहारा देता है, ज़मीन को उपजाऊ बनाता है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि साझा जल संसाधनों को नियंत्रित करने वाली संधियां “पवित्र और बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं” हैं, जिनका पूरी भावना और अक्षरशः पालन होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पानी को कभी दबाव बनाने या राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और न ही इसे बलपूर्वक दबाव का ज़रिया बनाया जाना चाहिए।

गौर करने वाली बात यह है कि शहबाज़ ने अपने भाषण में कहीं भी सीधे तौर पर भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन संदर्भ बिल्कुल स्पष्ट था। उन्होंने SCO Plus Format की बैठक में यह बयान ऐसे समय दिया जब एक दिन पहले ही हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) ने सिंधु जल संधि को लेकर एक अहम फैसला सुनाया था।

इसके अलावा शहबाज़ ने अपने भाषण में अमेरिका-ईरान तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों का भी ज़िक्र किया, और “इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग” को इस संघर्ष को खत्म करने का सबसे व्यावहारिक और टिकाऊ रास्ता बताया। लेकिन भारत में जिस बात ने सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा, वह उनका पानी को लेकर दिया गया बयान ही था।

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सिंधु जल संधि: 1960 से अब तक का सफर

इस पूरे विवाद को समझने के लिए सिंधु जल संधि की पृष्ठभूमि जानना ज़रूरी है। यह संधि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी बेसिन की छह नदियों का बंटवारा किया गया — तीन पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत के नियंत्रण में रखी गईं, जबकि तीन पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब) का ज़्यादातर पानी पाकिस्तान को मिलता है, हालांकि भारत को इन पर सीमित मात्रा में जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का अधिकार है।

यह संधि दशकों तक दोनों देशों के बीच तनाव और यहां तक कि युद्धों के बावजूद कायम रही, और इसे दक्षिण एशिया में जल-कूटनीति की एक मिसाल माना जाता रहा। लेकिन हाल के वर्षों में यह रिश्ता तनावपूर्ण होता गया। जनवरी 2023 में भारत ने पाकिस्तान को संधि में संशोधन के लिए एक औपचारिक नोटिस भी भेजा था, जिसमें किशनगंगा और रातले जैसी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान की बार-बार होने वाली आपत्तियों और मध्यस्थता की मांगों का ज़िक्र था।

लेकिन असली मोड़ अप्रैल 2025 में आया।

पहलगाम हमला और भारत का जवाब

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके में स्थित बैसरन घाटी में आतंकवादियों ने पर्यटकों पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए। यह हमला ऐसे समय हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब की राजकीय यात्रा पर थे और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भारत के दौरे पर थे। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े “द रेजिस्टेंस फ्रंट” को ज़िम्मेदार ठहराया।

हमले के अगले ही दिन, 23 अप्रैल को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में भारत ने कई बड़े कूटनीतिक फैसले लिए — भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित (abeyance में) रखने की घोषणा की, पाकिस्तानी नागरिकों के वीज़ा रद्द किए, पाकिस्तानी उच्चायोग में सैन्य सलाहकारों की नियुक्ति रद्द की, राजनयिक संबंधों को कमज़ोर किया, और अटारी-वाघा सीमा को व्यापार व आवाजाही के लिए बंद कर दिया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता। भारत की तरफ से यह पहला मौका था जब उसने इस 65 साल पुरानी संधि को इतने बड़े स्तर पर चुनौती दी, और इसे विशेषज्ञों ने भारत की परंपरागत संयमित नीति से एक बड़ा बदलाव बताया।

इसके जवाब में पाकिस्तान ने भी कड़ा रुख अपनाया। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की अध्यक्षता में हुई नेशनल सिक्योरिटी कमेटी की बैठक में पाकिस्तान ने शिमला समझौते सहित अन्य द्विपक्षीय समझौतों को निलंबित करने, भारत के साथ व्यापार रोकने, अपना हवाई क्षेत्र भारतीय विमानों के लिए बंद करने का फैसला लिया। साथ ही पाकिस्तान ने यह भी चेतावनी दी कि सिंधु जल संधि के तहत मिलने वाले पानी को अगर मोड़ा गया, तो इसे “युद्ध की कार्रवाई” (Act of War) माना जाएगा।

इसके बाद मई 2025 में भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की, जिसे पहलगाम हमले का सीधा जवाब बताया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने 12 मई 2025 को राष्ट्र के नाम संबोधन में स्पष्ट किया कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती पर छिपे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता, तब तक भारत सिंधु जल संधि पर कोई बातचीत नहीं करेगा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि एक साल से ज़्यादा समय बीतने के बावजूद भारत का रुख नहीं बदला है। मई 2026 में ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर भी विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि सिंधु जल संधि तब तक स्थगित रहेगी जब तक इस्लामाबाद सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को पूरी तरह त्याग नहीं देता।

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हेग कोर्ट का हालिया फैसला

शहबाज़ के SCO वाले बयान से ठीक एक दिन पहले, नीदरलैंड्स के हेग शहर में स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) ने सिंधु जल संधि को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इस अदालत ने पाकिस्तान के पक्ष में एकतरफा फैसला देते हुए कहा कि सिंधु जल संधि अभी भी लागू है और भारत द्वारा इसे एकतरफा तौर पर स्थगित करने का प्रयास मान्य नहीं है। साथ ही अदालत ने रातले जलविद्युत परियोजना पर निर्माण कार्य से जुड़े एक अंतरिम आदेश में भारत से संधि के तहत अपने दायित्वों को बनाए रखने को कहा।

यह ठीक इसी फैसले के अगले दिन था जब शहबाज़ शरीफ ने SCO के मंच से पानी को “जीवन रक्त” बताते हुए संधियों के सम्मान की बात कही — यानी उनका यह बयान सीधे तौर पर इस अंतरराष्ट्रीय अदालती फैसले को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश जैसा नज़र आया।

हालांकि भारत ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि वह सिंधु जल संधि के विवाद निपटान तंत्र के तहत PCA के अधिकार क्षेत्र को ही मान्यता नहीं देता, क्योंकि भारत का मानना है कि संधि के अनुसार तकनीकी मतभेदों के लिए एक तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) की नियुक्ति ही सही रास्ता है, न कि किसी मध्यस्थता अदालत का गठन। इसलिए भारत के लिए यह फैसला बाध्यकारी नहीं माना जा रहा, भले ही पाकिस्तान इसे अपनी कूटनीतिक जीत के तौर पर पेश कर रहा हो।

BJP का पलटवार: मीम, रील और “याद है ना?”

जैसे ही शहबाज़ के बयान की चर्चा भारतीय सोशल मीडिया पर शुरू हुई, बीजेपी के आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। पार्टी ने एक वीडियो रील पोस्ट की, जिसका कैप्शन था — “पानी… पानी… पानी? भारतीय सेना ने पिलाया था पानी, याद है ना?”

इस रील में सबसे पहले शहबाज़ शरीफ का SCO समिट वाला बयान दिखाया गया, जिसमें वे पानी को हथियार न बनाने की अपील कर रहे थे। इसके ठीक बाद भारतीय सेना से जुड़े सैन्य अभियानों के फुटेज दिखाए गए — जो सीधे तौर पर ऑपरेशन सिंदूर और उससे जुड़ी कार्रवाइयों की ओर इशारा करते हैं। इस रील का लहजा तंज भरा था, और इसका मकसद यह याद दिलाना था कि भारत ने पहले ही पाकिस्तान को सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर करारा जवाब दे दिया है — चाहे वह सीमा पार आतंकवाद का जवाब हो या सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला।

यह पहला मौका नहीं है जब बीजेपी या भारतीय नेताओं ने पाकिस्तान के किसी बयान पर पानी को लेकर तंज कसा हो। इससे पहले भी जब-जब पाकिस्तानी नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाया है, भारतीय पक्ष से यही संदेश दिया गया है कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते” — यह वह पंक्ति है जो प्रधानमंत्री मोदी ने पहलगाम हमले के बाद इस्तेमाल की थी और जो अब भारत की सिंधु जल नीति का एक तरह से अनौपचारिक नारा बन चुकी है।

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विश्लेषण: कूटनीतिक शतरंज की एक और चाल

इस पूरे प्रकरण को महज़ सोशल मीडिया की नोकझोंक के तौर पर देखना भूल होगी। असल में यह भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही एक बड़ी कूटनीतिक और सूचना-युद्ध की रणनीति का हिस्सा है।

पाकिस्तान के लिए सिंधु जल संधि सिर्फ एक तकनीकी या पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व से जुड़ा सवाल है, क्योंकि पाकिस्तान की खेती और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर है। इसीलिए शहबाज़ सरकार हर अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल कर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करती रही है — चाहे वह संयुक्त राष्ट्र हो, SCO हो, या फिर हेग की अदालत।

दूसरी तरफ भारत के लिए सिंधु जल संधि को स्थगित रखना एक ऐसा कूटनीतिक हथियार बन गया है जिसका इस्तेमाल वह बिना सीधे सैन्य टकराव के भी पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखने के लिए कर सकता है। भारत सरकार का रुख साफ है — जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक इस मुद्दे पर कोई नरमी नहीं दिखाई जाएगी।

ऐसे में BJP की सोशल मीडिया टीम की यह रणनीति समझ में आती है — जब भी पाकिस्तान का कोई नेता अंतरराष्ट्रीय मंच से “पीड़ित” की तरह भारत पर पानी रोकने का आरोप लगाता है, भारतीय पक्ष तुरंत इसे ऑपरेशन सिंदूर और सैन्य कार्रवाई की याद दिलाकर जवाब देता है। यह रणनीति घरेलू राजनीति के लिहाज़ से भी अहम है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि मौजूदा सरकार पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी तरह की नरमी नहीं बरत रही और हर मोर्चे पर मुंहतोड़ जवाब दे रही है।

हालांकि यह भी सच है कि सिंधु जल संधि को लेकर लंबे समय तक चलने वाला यह गतिरोध क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंता का विषय भी है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस बात को लेकर आगाह करते रहे हैं कि पानी जैसे बुनियादी संसाधन को राजनीतिक हथियार बनाना दीर्घकालिक तौर पर पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए जोखिम भरा हो सकता है, खासकर तब जब दोनों ही परमाणु शक्ति संपन्न देश हों।

शहबाज़ शरीफ का SCO समिट में दिया गया बयान भले ही “पानी” और “मानवता” की भाषा में लिपटा हुआ था, लेकिन उसका असली मकसद अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को कठघरे में खड़ा करना था। लेकिन भारत, खासतौर पर सत्तारूढ़ बीजेपी, ने इस मौके को अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हुए यह याद दिलाने में देर नहीं लगाई कि पहलगाम हमले के बाद भारत ने न सिर्फ सिंधु जल संधि को स्थगित किया, बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिए सैन्य स्तर पर भी करारा जवाब दिया।

यह पूरा घटनाक्रम इस बात का उदाहरण है कि कैसे आज के दौर में कूटनीति, सोशल मीडिया और घरेलू राजनीति आपस में गुंथी हुई हैं। हेग की अदालत का फैसला भले ही पाकिस्तान के पक्ष में गया हो, लेकिन भारत का रुख स्पष्ट है कि जब तक आतंकवाद का मुद्दा हल नहीं होता, सिंधु जल संधि पर कोई नरमी नहीं दिखाई जाएगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मुद्दा किसी बातचीत की मेज़ तक पहुंचता है, या फिर यह इसी तरह अंतरराष्ट्रीय मंचों और सोशल मीडिया पर बयानबाज़ी और पलटवार तक ही सीमित रहता है।


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