18वें BRICS समिट 2026 की पूरी जानकारी — दिल्ली में पुतिन, पेज़ेशकियान, शी जिनपिंग के आगमन से लेकर सुरक्षा इंतज़ाम, दो दिन का शेड्यूल, एजेंडा और न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन तक, सब कुछ एक जगह पढ़ें।

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BRICS समिट 2026: दिल्ली में जुटे दुनिया के बड़े नेता, पुतिन-पेज़ेशकियान समेत कई राष्ट्राध्यक्ष पहुंचे भारत
भारत की राजधानी नई दिल्ली एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है। 12 और 13 सितंबर 2026 को यहां 18वां BRICS समिट आयोजित हो रहा है, जिसकी मेज़बानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। यह आयोजन भारत मंडपम (Bharat Mandapam) में हो रहा है — वही स्थल जहां 2023 में G20 समिट का आयोजन हुआ था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान और कई अन्य वैश्विक नेता शुक्रवार से ही दिल्ली पहुंचना शुरू हो गए हैं, जिससे राजधानी में सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियां चरम पर पहुंच गई हैं।
यह समिट ऐसे समय हो रहा है जब यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी संघर्ष वैश्विक राजनीति पर गहरा असर डाल रहे हैं। ऐसे में 11 सदस्यीय विस्तारित BRICS समूह की एकजुटता पर भी दुनिया भर की नज़र है।
BRICS क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
Putin visit to india,BRICS मूल रूप से ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका — इन पांच देशों का एक समूह था, जो दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं (emerging economies) को एक मंच पर लाने के लिए बनाया गया था। इसका मकसद पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाली वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज़ को मज़बूत करना रहा है।
हाल के वर्षों में इस समूह का तेज़ी से विस्तार हुआ है। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इसके सदस्य बने, और 2025 में इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हो गया। इस तरह अब BRICS में कुल 11 पूर्ण सदस्य देश हैं — ब्राज़ील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात। इस विस्तार के बाद BRICS अब वैश्विक जनसंख्या और अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय अहमियत और बढ़ गई है।
यह समिट BRICS की स्थापना की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर भी हो रहा है, जो इस आयोजन को और खास बनाता है।
दिल्ली में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम
Brics meeting,इतने बड़े पैमाने पर वैश्विक नेताओं के जमावड़े को देखते हुए दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की है। रिपोर्टों के अनुसार करीब 15,000 दिल्ली पुलिस कर्मियों को तैनात किया गया है, साथ ही लगभग 200 अर्धसैनिक बलों की कंपनियां भी अतिरिक्त सुरक्षा के लिए लगाई गई हैं।
समिट को देखते हुए दिल्ली के मध्य क्षेत्रों में यातायात प्रतिबंध लागू किए गए हैं, और दिल्ली पुलिस ने नागरिकों से इन प्रबंधों में सहयोग करने की अपील की है। सुरक्षा कारणों से शुक्रवार को दिल्ली में सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया गया, ताकि सड़कों पर आम यातायात कम रहे और वीवीआईपी मूवमेंट सुचारू रूप से हो सके। एयरस्पेस पर भी विशेष प्रतिबंध लगाए गए हैं।
किन नेताओं का हो रहा है आगमन?
शुक्रवार सुबह से ही विदेशी नेताओं का दिल्ली पहुंचना शुरू हो गया।
व्लादिमीर पुतिन (रूस): रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शुक्रवार तड़के दिल्ली के पालम एयरफोर्स स्टेशन पर उतरे। उनकी अगवानी भारत के विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने की। यह उल्लेखनीय है कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से पुतिन का यह पहला मौका है जब वे किसी BRICS समिट में सशरीर हिस्सा ले रहे हैं। पुतिन की यह तीन दिवसीय यात्रा है और वे प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी करेंगे, जो दोपहर बाद 3:30 बजे प्रस्तावित है। इस मुलाकात में भारत-रूस संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी बातचीत होने की उम्मीद है।
मसूद पेज़ेशकियान (ईरान): ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान भी दिल्ली पहुंच चुके हैं। यह उनकी ईरानी राष्ट्रपति के रूप में भारत की पहली यात्रा है। ईरान इस समय पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के केंद्र में है, ऐसे में उनकी यह यात्रा और मोदी के साथ प्रस्तावित मुलाकात कूटनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। माना जा रहा है कि मिडिल ईस्ट संकट इस बैठक के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल रहेगा।
शी जिनपिंग (चीन): चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी समिट में शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि समिट से पहले तक चीन की ओर से उनकी यात्रा की औपचारिक पुष्टि नहीं की गई थी, लेकिन तैयारियों से संकेत मिल रहे थे कि वे दिल्ली आ सकते हैं। अगर शी जिनपिंग समिट में शामिल होते हैं, तो यह सात साल बाद उनकी भारत यात्रा होगी, जो भारत-चीन संबंधों के लिहाज़ से भी अहम मानी जा रही है।
अन्य नेता: इनके अलावा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबिआंतो के भी समिट में शामिल होने की पुष्टि हो चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी शुक्रवार को इन नेताओं के साथ भी द्विपक्षीय बैठकें करेंगे।
कुल मिलाकर, यह समिट एक ऐसा मंच बन गया है जहां एक साथ रूस, चीन, ईरान, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे अहम देशों के शीर्ष नेता मौजूद हैं — जो मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए बेहद असाधारण स्थिति है।
भारत की अध्यक्षता (Chairship) और थीम
2026 में BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है, और इस चक्र के लिए भारत ने जो थीम तय की है वह है — “Building Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” (लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण), जिसे एक व्यापक “Humanity First” (मानवता पहले) दृष्टिकोण के तहत रखा गया है।
भारत की अध्यक्षता के दौरान साल भर विभिन्न स्तरों पर कई मंत्रिस्तरीय बैठकें और कार्यसमूह की बैठकें हुई हैं। उदाहरण के लिए, BRICS संचार मंत्रियों की बैठक में सूचना-संचार तकनीक (ICT) सहयोग, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, नवाचार और मज़बूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर चर्चा हुई। इसी तरह शिक्षा क्षेत्र में अकादमिक सहयोग और ज्ञान के आदान-प्रदान पर काम हुआ, जबकि श्रम एवं रोज़गार ट्रैक में सामाजिक सुरक्षा, कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी और डिजिटल कौशल जैसे विषयों पर मंथन हुआ।
दो दिवसीय समिट का पूरा शेड्यूल
MEA (विदेश मंत्रालय) की ओर से जारी विस्तृत कार्यक्रम के अनुसार, समिट का शेड्यूल इस प्रकार है:
12 सितंबर, शनिवार — पहला दिन
पहला दिन मुख्य रूप से BRICS के पूर्ण सदस्य देशों के लिए है।
- दिन की शुरुआत BRICS सदस्य देशों के नेताओं के बीच एक बंद कमरे (closed-door) सत्र से होगी, जिसका विषय है — “समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मज़बूत करना” (Inclusive Global Governance and Strengthening Multilateralism)। यह सत्र भारत के इस प्रयास को रेखांकित करता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक फैसलों में ज़्यादा प्रभावी आवाज़ मिले।
- इसके अलावा दिन में एक इनोवेशन प्रदर्शनी (innovation exhibition) आयोजित की जाएगी, जिसमें सदस्य देशों की तकनीकी उपलब्धियों को प्रदर्शित किया जाएगा।
- एक संयुक्त वृक्षारोपण कार्यक्रम (joint tree-planting exercise) भी रखा गया है, जो सततता (sustainability) के थीम से जुड़ा प्रतीकात्मक आयोजन है।
- शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से आयोजित एक गाला डिनर होगा, जिसमें सभी नेता शामिल होंगे। यह अनौपचारिक मुलाकात द्विपक्षीय बातचीत और आपसी तालमेल बढ़ाने का अहम अवसर मानी जा रही है।
13 सितंबर, रविवार — दूसरा दिन
दूसरे दिन पार्टनर देशों और आउटरीच में आमंत्रित अतिथियों की भी भागीदारी होगी।
- सुबह 10:50 बजे मुख्य खुला सत्र (open session) शुरू होगा, जिसका विषय है — “Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability: Shaping the Future for Inclusive Global Growth” यानी समावेशी वैश्विक विकास के भविष्य को आकार देना।
- इस सत्र में BRICS के पूर्ण सदस्यों के अलावा पार्टनर देशों और विशेष रूप से आमंत्रित अतिथि देशों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे, जिससे मंच और व्यापक हो जाएगा।
- समिट का समापन नई दिल्ली घोषणापत्र (New Delhi Declaration) के जारी होने के साथ होगा। यह दस्तावेज़ इस विस्तारित समूह के बीच बनी सहमति के बिंदुओं को दर्शाएगा और आगे की साझा प्राथमिकताओं को तय करेगा।
एजेंडे में क्या-क्या शामिल है?
BRICS का एजेंडा इस बार व्यापक लेकिन स्पष्ट है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, चर्चा के मुख्य बिंदुओं में शामिल हैं:
- व्यापार और आर्थिक सहयोग: सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और विकास वित्त (development finance) को बढ़ावा देना।
- तकनीक और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन: डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, नवाचार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग।
- ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा: सदस्य देशों के बीच ऊर्जा आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने पर चर्चा।
- स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन: स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग और आपदाओं से निपटने की तैयारी।
- आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा: महत्वपूर्ण (critical) वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित और स्थिर बनाना।
- वैश्विक संस्थाओं में सुधार: संयुक्त राष्ट्र सहित बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की मांग, ताकि वे मौजूदा वैश्विक हकीकत को बेहतर तरीके से प्रतिबिंबित कर सकें।
इसके अलावा नेता आपस में क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर के अहम मुद्दों पर भी विचार साझा करेंगे। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि नेता “पारस्परिक महत्व के वैश्विक और क्षेत्रीय मामलों” पर अपने विचार रखेंगे — जिसमें यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट संकट जैसे संवेदनशील विषय भी शामिल हो सकते हैं।
पृष्ठभूमि में छाए यूक्रेन और मिडिल ईस्ट युद्ध
इस समिट की खास बात यह है कि यह ऐसे वक्त हो रहा है जब वैश्विक राजनीति दो बड़े संघर्षों से जूझ रही है — रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव, जिसमें ईरान सीधे तौर पर शामिल है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह समिट आर्थिक एजेंडे से ज़्यादा इन्हीं युद्धों के साये में रहने वाला है। पुतिन की मौजूदगी पश्चिमी देशों के साथ रूस के तनावपूर्ण रिश्तों की पृष्ठभूमि में हो रही है, वहीं पेज़ेशकियान की भारत यात्रा ईरान के लिए ऐसे समय में हो रही है जब उसका देश युद्ध की स्थिति से गुज़र रहा है। ऐसे में यह समिट सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि एक अहम कूटनीतिक अवसर भी बन गया है, जहां विवादित मुद्दों पर भी अनौपचारिक बातचीत संभव है।
समिट से इतर, मध्य पूर्व से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण खबर यह है कि ईरान और खाड़ी देशों के बीच होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़े शिपिंग समझौते को लेकर ओमान में बातचीत होने वाली है, जो इस क्षेत्रीय तनाव को कम करने की दिशा में एक कदम हो सकता है।
भारत के लिए इस समिट का महत्व
प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह समिट कई मायनों में खास है। एक ही मंच पर शी जिनपिंग की भारत वापसी (सात साल बाद), पुतिन के साथ सीधी बातचीत का मौका, और ईरान के राष्ट्रपति की पहली भारत यात्रा — यह तीनों घटनाक्रम भारत की कूटनीतिक स्थिति को और मज़बूत करते हैं।
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान लगातार यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को मंच देने वाला एक ज़िम्मेदार और संतुलनकारी (balancing) खिलाड़ी है। इसी क्रम में BRICS संसदीय मंच में भी भारत ने आगामी वर्षों की मेज़बानी की ज़िम्मेदारी ली है। हाल ही में ब्राज़ीलिया में हुए 11वें BRICS संसदीय मंच के समापन पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा की थी कि 2026 में भारत अगले BRICS संसदीय मंच की मेज़बानी करेगा। उस मंच पर सदस्य देशों ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले की एक स्वर में निंदा की थी और आतंकवाद के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस नीति अपनाने की बात कही थी।
BRICS की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत से पहले की मेज़बानियां
यह पहली बार नहीं है जब भारत BRICS समिट की मेज़बानी कर रहा है। भारत इससे पहले भी कई बार इस समूह की अध्यक्षता कर चुका है, और हर बार अलग-अलग वैश्विक चुनौतियों के हिसाब से इसका एजेंडा तय हुआ है।
- 2012 की अध्यक्षता: चौथा BRICS समिट 29 मार्च 2012 को नई दिल्ली में ही आयोजित हुआ था, जिसकी थीम थी — “BRICS Partnership for Global Stability, Security and Prosperity”। उस समय नेताओं ने दिल्ली घोषणापत्र अपनाया था, जिसमें असमान आर्थिक रिकवरी, सॉवरेन डेट जोखिम और सतत विकास पर ज़ोर दिया गया था।
- 2016 की अध्यक्षता: इस दौर में भारत ने आतंकवाद-रोधी मुद्दों को एजेंडे में मज़बूती से रखा और FATF मानकों को अपनाने पर ज़ोर दिया। भारत ने BRICS-BIMSTEC आउटरीच समिट की भी मेज़बानी की, जिससे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को व्यापार, ऊर्जा, निवेश, पर्यावरण, तकनीक और मानव विकास जैसे क्षेत्रों में आतंकवाद-रोधी रणनीति के साथ जोड़ा गया।
- 2021 की अध्यक्षता: इस दौर में एक अहम दस्तावेज़ सामने आया — “Joint Statement on Strengthening and Reforming the Multilateral System”, जिसमें संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध समिति जैसी संस्थाओं की कमियों को स्वीकार करते हुए वैश्विक शासन को अधिक समावेशी और जवाबदेह बनाने की मांग की गई थी।
इस पृष्ठभूमि को देखते हुए 2026 का समिट भारत की चौथी बड़ी BRICS मेज़बानी है, और यह समूह के 20 साल पूरे होने के अवसर पर हो रहा है, जिससे इसका प्रतीकात्मक महत्व और बढ़ जाता है।
नई दिल्ली घोषणापत्र से क्या उम्मीदें?
समिट के समापन पर जारी होने वाला न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन इस बात का संकेत देगा कि विस्तारित BRICS समूह किन-किन मुद्दों पर आम सहमति बना पाया है। विश्लेषकों के अनुसार, इस घोषणापत्र में खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, कनेक्टिविटी (आपसी संपर्क) और उच्च तकनीक सहयोग जैसे साझा प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को शामिल किए जाने की उम्मीद है।
हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट संकट जैसे संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दों पर भी समूह कोई साझा रुख अपना पाता है, क्योंकि सदस्य देशों के इन मुद्दों पर अलग-अलग हित और नज़रिए हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ यह मानते हैं कि विस्तार के बाद अब BRICS के भीतर एकजुटता बनाए रखना पहले से ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
18वां BRICS समिट सिर्फ एक और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भर नहीं है, बल्कि यह मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक अहम कूटनीतिक पड़ाव है। एक ओर जहां यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट संकट वैश्विक स्थिरता के लिए चुनौती बने हुए हैं, वहीं दूसरी ओर रूस, चीन, ईरान, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे अहम देशों के नेताओं का दिल्ली में एक साथ जुटना इस बात का संकेत है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं का यह समूह वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति और प्रभाव को लगातार मज़बूत करता जा रहा है।
भारत के लिए यह समिट न सिर्फ अपनी कूटनीतिक कुशलता दिखाने का अवसर है, बल्कि यह भी साबित करने का मौका है कि वह वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को असरदार तरीके से आगे बढ़ा सकता है। अब सबकी निगाहें 13 सितंबर को जारी होने वाले नई दिल्ली घोषणापत्र पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि इस विस्तारित और विविधतापूर्ण समूह ने मौजूदा चुनौतियों के बीच कितनी साझा सहमति बनाई है।
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